अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल: चार साल में भारत के 4 पड़ोसी देशों में तख्तापलट

नई दिल्ली

पिछले चार सालों में भारत के पड़ोसी देशों में राजनीतिक हलचल ने अस्थिरता की नई परिभाषा गढ़ दी है। पिछले चार सालों में भारत के पड़ोसी देशों में राजनीतिक हलचल ने ऐसा तूफान खड़ा किया है कि अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और अब नेपाल—सबकी सत्ता हिल गई। काबुल में तालिबान का कब्जा, श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन में प्रदर्शनकारियों का ‘स्विमिंग पूल पार्टी’, और नेपाल में युवा-जनरेशन का जबरदस्त Gen-Z क्रेज—ये सब घटनाएं साबित करती हैं कि सत्ता अब किसी के लिए भी सुरक्षित नहीं रही।   

नेपाल में सोशल मीडिया पर लगे प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए प्रदर्शन इतने तेज़ी से फैल गए कि संसद और सुप्रीम कोर्ट तक आंदोलन की लहर पहुंच गई। पांच मंत्रियों के इस्तीफे, विपक्षी सांसदों की सामूहिक बगावत और राष्ट्रपति के घर तक प्रदर्शनकारियों का घेराव—प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली का इस्तीफा महज एक शुरुआत थी; विरोध की आग अब भी धधक रही है।

अफगानिस्तान: तालिबान की वापसी

2021 में अफगानिस्तान का राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह उलट-पुलट गया। अमेरिकी मदद से स्थापित अशरफ गनी सरकार धराशायी हो गई और तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया। अगस्त के महीने में शहर में दाखिल होते ही तालिबान ने राष्ट्रपति भवन पर नियंत्रण जमा लिया, जबकि एयरपोर्ट पर भगदड़ में 170 से अधिक लोग मारे गए। भ्रष्टाचार, कमजोर सेना और अमेरिकी सैनिकों की वापसी ने विद्रोह को हवा दी। आज भी तालिबान का शासन कायम है, महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियाँ हैं और पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की धमक लगातार बनी हुई है।

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श्रीलंका: आर्थिक संकट से राजनीति तक

अफगानिस्तान के संकट के ठीक एक साल बाद, 2022 में श्रीलंका आर्थिक तूफ़ान की चपेट में आ गया। महंगाई, ईंधन और दवाइयों की किल्लत ने राजधानी कोलंबो की सड़कों को जलते हुए अंगारों में बदल दिया। लाखों लोग प्रदर्शन के लिए सड़कों पर उतर आए, राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को रातोंरात देश छोड़ना पड़ा और प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने इस्तीफा देना पड़ा। विरोध इतना उग्र था कि राष्ट्रपति भवन और संसद तक प्रदर्शनकारियों के कदमों की आवाज गूंज उठी।

बांग्लादेश: छात्र आंदोलन और सत्ता परिवर्तन

2024 में बांग्लादेश के छात्र आंदोलनों ने ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया कि शेख हसीना की सरकार सत्ता की कुर्सी से खिसक गई। भ्रष्टाचार, मानवाधिकार उल्लंघन और आरक्षण नीति के खिलाफ सड़कों पर उतरे छात्रों ने पूरे देश की राजनीति हिला कर रख दी। हिंसक झड़पों और गोलीबारी में 300 से अधिक लोग अपनी जान गंवा बैठे। इसके बाद सेना ने अंतरिम सरकार बना दी, लेकिन आम चुनाव अब तक नहीं हो पाए हैं और देश में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल अब भी गरम है। बांग्लादेश आज भी संघर्ष और आंदोलन की ज्वाला में झुलस रहा है।

पाकिस्तान में चार बार तख्तापलट

पाकिस्तान में 1947 से ही सेना का हस्तक्षेप सत्ता में रहा है. पाकिस्तान ने एक दो नहीं बल्कि चार बार तख्तापलट का दंश झेला है. पहला तख्तापलट 1953-54 में हुआ. इसके बाद 1958 में सत्ता बदली जब पाकिस्तानी राष्ट्रपति मेजर जनरल इस्कंदर अली मिर्जा ने पाकिस्तान की संविधान सभा और तत्कालीन फिरोज खान नून की सरकार को बर्खास्त किया था. फिर आया 1977 का दौर. तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगे. चुनावों में धांधली के विवाद के बीच सेना प्रमुख जिया उल हक ने तख्तापलट किया. 1999 में फिर वही कहानी दोहराई गई जब सेना प्रमुख परवेज मुशर्रफ ने सैन्य तख्तापलट कर नवाज शरीफ को सत्ता से बेदखल किया था. 

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अन्य पड़ोसी देश: पाकिस्तान और मालदीव

पाकिस्तान में इमरान खान के हटने के बाद राजनीति का पारा लगातार उँचा है। इमरान समर्थकों की रैलियां, हिंसक झड़पें और देशभर में तनाव ने सरकारी तंत्र को हिला कर रख दिया है। वहीं, बलूचिस्तान में अलगाववादी गुट सत्ता के लिए लगातार चुनौती बने हुए हैं। दूसरी तरफ़ मालदीव में नव निर्वाचित राष्ट्रपति मुइज़्ज़ू के ‘भारत विरोधी’ रुख़ और उनकी रूढ़िवादी नीतियों ने द्विपक्षीय संबंधों में खटास पैदा कर दी है। घरेलू स्तर पर भी उनका प्रशासन पिछली सरकार की तुलना में कड़ा और जुझारू नजर आ रहा है। 

यहां लगा अमेरिका पर आरोप

भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश भी 2024 में इसी तरह की आग में जल उठा था. शेख हसीना की सरकार पर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और दमन के आरोप थे. जुलाई 2024 में सरकारी नौकरियों में 30% कोटा प्रणाली के खिलाफ छात्र आंदोलन शुरू हुआ. जल्दी ही यह आंदोलन व्यापक हो गया. सड़कों पर उतरे लाखों युवाओं ने शेख हसीना के खिलाफ नारे लगाए और देखते ही देखते बांग्लादेश में तख्तापलट की घटना घटी. बता दें कि बांग्लादेश में तख्तापलट की घटना से अमेरिका पर आरोप लगा था. शेख हसीना के बेटे ने तख्तापलट के लिए अमेरिका पर शक जताया था.

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श्रीलंका की घटना 

इसके अलावा साल 2022 में श्रीलंका में भी तख्तापलट की घटन देखी गई. श्रीलंका की अर्थव्यवस्था चरम संकट में थी. ईंधन, दवा, भोजन की भारी किल्लत थी. श्रीलंका ऋणों के बोझ तले दबा था लोगों का मानना था कि राजपक्षे परिवार की भ्रष्ट शासन ने जनता को तंग कर दिया. भारी संख्या में परेशान जनता सड़क पर उतरी. राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद के बाहर डेरा डाला 'गोटा गो गोटा' यानी राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे सत्ता छोड़ो के नारे लगे. जुलाई 2022 तक आंदोलन इतना उफान मार गया कि गोटाबाया को देश छोड़कर भागना पड़ा.  

अफगानिस्तान भी झेल चुका है तख्तापलट का दंश

अफगानिस्तान में भी तख्तापलट की घटना घट चुकी है. अगस्त 2021 में अमेरिका की सेना हटने के बाद अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा हो गया. तालिबान ने 2021 में अफगानिस्तान की गनी सरकार का तख्तापलट किया था, जिसके बाद से यहां तालिबानी शासन है.