नई दिल्ली
साल 2026 भारत की विदेश नीति के लिए एक नई सुबह लेकर आया है. जहां एक तरफ भारत को रोज धमकियां देने वाले ट्रंप को भारत पर से टैरिफ हटाने के लिए मजबूर होना पड़ा. वहीं, हिमालय के उस पार से भी शांति और मेल-मिलाप के संकेत मिल रहे हैं. भारत में चीन के राजदूत जू फेइहोंग का रविवार का बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि बीजिंग अब नई दिल्ली के साथ अपने रिश्तों को शत्रुता के बजाय सहयोग के तराजू पर तौलने को मजबूर है.
चीन के राजदूत जू फेइहोंग ने एक्स पर लिखा, चीन भारत के साथ मिलकर उस महत्वपूर्ण आम सहमति को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है, जिसमें दोनों देश एक-दूसरे के लिए सहयोग के भागीदार और विकास के अवसर हैं. यह बयान पिछले कुछ वर्षों के कड़वे और तनावपूर्ण संबंधों के बाद एक बड़ी नरमी की ओर इशारा करता है. उन्होंने पारस्परिक लाभ के दायरे को और अधिक विस्तार देने की बात कही है. इसका सीधा अर्थ यह है कि दोनों देशों की आर्थिक रणनीतियों को एक दिशा में लाकर व्यापारिक और व्यावहारिक सहयोग को गहरा किया जाए.
ब्रिक्स में भारत का साथ
चीन ने ब्रिक्स की अध्यक्षता के लिए भारत की भूमिका का पुरजोर समर्थन किया है. बहुपक्षीय मंचों पर भारत की बढ़ती ताकत को स्वीकार करना चीन की कूटनीतिक विवशता और रणनीति दोनों का हिस्सा है. राजदूत ने दोनों देशों के नागरिकों के बीच आपसी संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देने पर जोर दिया है, ताकि दोनों देशों के लोग एक-दूसरे के करीब आ सकें.
बीजिंग के इस हृदय परिवर्तन के पीछे की असली वजह
आखिर चीन, जो कल तक सीमा पर आक्रामक रुख अपनाए हुए था, आज दोस्ती की बात क्यों कर रहा है? इसके पीछे वजह है.
चीन की अपनी अर्थव्यवस्था इस समय मंदी और आंतरिक चुनौतियों से जूझ रही है. भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े और तेजी से बढ़ते बाजार को लंबे समय तक छोड़ना चीन के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है. व्यापारिक घाटे और भारतीय कड़े रुख के कारण चीनी कंपनियों को भारी नुकसान हुआ है.
अमेरिका ने जिस तरह से भारत के साथ अपने रक्षा और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत किया है, उसने चीन को बेचैन कर दिया है. हाल ही में भारत को शुल्कों में मिली छूट इस बात का प्रमाण है कि भारत अब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बन रहा है. चीन को डर है कि अगर वह अब भी अड़ा रहा, तो भारत पूरी तरह से पश्चिमी गुट के पाले में चला जाएगा.
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह से वैश्विक व्यवस्था बदली है, उसमें भारत एक ‘ग्लोबल साउथ’ की आवाज बनकर उभरा है. चीन जानता है कि एशिया की राजनीति में बिना भारत के सहयोग के वह अपनी धाक नहीं जमा सकता.
भारत की गजब डिप्लोमेसी
चीन के इस शांति प्रस्ताव को भारत बड़े ही सतर्क नजरिए से देख रहा है. भारतीय विदेश नीति के रणनीतिकारों के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है. इसलिए भारत बहुत सोच समझकर आगे बढ़ रहा है. 2020 की गलवान घाटी की घटना के बाद भारत और चीन के बीच जो ‘विश्वास का संकट’ पैदा हुआ है, वह महज बयानों से दूर नहीं हो सकता. भारत का रुख साफ है कि जब तक सीमा पर शांति और यथास्थिति बहाल नहीं होती, तब तक व्यापार और संबंधों का सामान्य होना मुश्किल है.
अमेरिका या चीन कौन बेहतर दोस्त
भारत इस समय उस स्थिति में है जहां वह दुनिया की दो बड़ी शक्तियों के साथ अपनी शर्तों पर संवाद कर रहा है. एक तरफ अमेरिका है जो भारत को रक्षा तकनीक दे रहा है, और दूसरी तरफ चीन है जो व्यापारिक लाभ का लालच दे रहा है. भारत की असली चुनौती इन दोनों के बीच अपनी ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ को बचाए रखने की है. राजदूत जू फेइहोंग का बयान निश्चित रूप से स्वागत योग्य है, लेकिन इसे जमीन पर उतरने में अभी समय लगेगा. 2026 की यह बदली हुई कूटनीति दिखाती है कि भारत अब किसी का ‘पिछलग्गू’ नहीं, बल्कि वह केंद्र है जिसके इर्द-गिर्द महाशक्तियों की नीतियां घूम रही हैं. वहीं भारत का लक्ष्य स्पष्ट है. साझेदारी में अवसर तो तलाशने हैं, लेकिन अपनी संप्रभुता और सुरक्षा की कीमत पर नहीं. चीन के साथ ‘सहयोग के दायरे’ को बढ़ाने से पहले पुरानी कड़वाहटों और सीमा विवादों का स्थायी समाधान जरूरी है.