मिड-डे मील योजना, एक लीटर दूध को बनाया एक बाल्टी फिर बाँट दिया बच्चों को, विडियो देखे आप भी हो जाएँगे हैरान

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में मिड-डे मील योजना (Mid Day Meal scheme) के क्रियान्वयन पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. महोबा जिले (Mahoba District) के एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय (Government Primary School) का वीडियो सोशल मीडिया (Social Media) पर तेजी से वायरल (Viral Video) हो रहा है, जिसमें बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण के साथ खिलवाड़ होता दिख रहा है. वायरल विजुअल्स में कथित तौर पर बाल्टी भर पानी में दूध (Water Mixed With Milk) के दो पैकेट मिलाकर बच्चों को परोसते हुए दिखाया गया है. इस घटना ने अभिभावकों और स्थानीय ग्रामीणों में भारी रोष पैदा कर दिया है.

 

यह मामला महोबा के धिकवाहा प्राथमिक विद्यालय का बताया जा रहा है. वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि मिड-डे मील के दौरान आधा-आधा लीटर के दो दूध के पैकेट एक बड़ी बाल्टी पानी में उड़ेले गए. इस पतले मिश्रण को ही स्कूल के बच्चों में वितरित कर दिया गया. ग्रामीणों का आरोप है कि स्कूल प्रशासन बच्चों के निर्धारित पोषण मानकों की खुलेआम अनदेखी कर रहा है और उन्हें केवल ‘सफेद पानी’ पिलाया जा रहा है.

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स्कूल के दौरान सोती दिखीं प्रधानाध्यापिका

 

उसी स्कूल का एक और वीडियो सामने आया है, जिसने लापरवाही की पोल खोल दी है. इस क्लिप में स्कूल की प्रधानाध्यापिका कथित तौर पर स्कूल समय के दौरान गहरी नींद में सोती हुई नजर आ रही हैं. एक तरफ बच्चों को खराब गुणवत्ता का भोजन दिया जा रहा है और दूसरी तरफ शिक्षण कार्य के समय शिक्षिका का यह गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार स्थानीय लोगों के गले नहीं उतर रहा है.

शिक्षा विभाग ने लिया संज्ञान

 

वीडियो वायरल होने के बाद शिक्षा विभाग हरकत में आ गया है. महोबा के बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) राहुल मिश्रा ने मामले की पुष्टि करते हुए बताया कि आरोपी प्रधानाध्यापिका को ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी किया गया है.

 

अधिकारी ने दो दिनों के भीतर जवाब मांगा है और स्पष्ट किया है कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित स्टाफ के खिलाफ कड़ी विभागीय कार्रवाई की जाएगी.

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बार-बार सामने आ रही लापरवाही

 

उत्तर प्रदेश में मिड-डे मील से जुड़ी यह पहली घटना नहीं है। इससे पहले भी कई जिलों से नमक-रोटी या पतला दूध परोसने की खबरें आती रही हैं. जानकारों का मानना है कि स्कूल स्तर पर उचित निगरानी और जवाबदेही की कमी के कारण इस तरह के मामले बार-बार दोहराए जा रहे हैं, जिसका सीधा असर गरीब परिवारों के बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.