शंकराचार्य की परंपरा मर्यादा से चलती है, मनमर्जी से नहीं: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

शंकराचार्य की परंपरा मर्यादा से चलती है, मनमर्जी से नहीं: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 

सीएम ने कहा, कानून सबके लिए समान, मुख्यमंत्री का पद भी कानून से ऊपर नहीं

सरकार कानून के शासन में विश्वास करती है, मर्यादा व व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारीः मुख्यमंत्री 

नैतिकता की बात करने वालों को पहले परंपरा व व्यवस्था का सम्मान करना चाहिएः सीएम योगी 

लखनऊ
 विधानसभा में चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शंकराचार्य विवाद पर पूरी मजबूती से सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने सनातन परंपरा की मर्यादाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि शंकराचार्य का पद भारत की सनातन परंपरा में सर्वोच्च और अत्यंत पवित्र माना जाता है। यह कोई सामान्य उपाधि नहीं है, जिसे कोई भी व्यक्ति स्वयं ग्रहण कर ले। सपा शासनकाल में हुई वाराणसी की पुरानी घटना का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने प्रश्न उठाया कि यदि संबंधित व्यक्ति वास्तव में शंकराचार्य थे, तो उन पर लाठीचार्ज और एफआईआर क्यों हुई?  नैतिकता की बात करने वालों को पहले परंपरा और व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए। माघ मेला में मौनी अमावस्या के अवसर पर साढ़े चार करोड़ श्रद्धालुओं के आगमन का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे अवसरों पर कड़ी व्यवस्था लागू करनी होती है। प्रवेश और निकास मार्ग निर्धारित होते हैं और उनका पालन सभी के लिए अनिवार्य है। नियमों की अनदेखी भगदड़ जैसी स्थिति पैदा कर सकती है, जिससे श्रद्धालुओं की जान खतरे में पड़ सकती है।

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मुख्यमंत्री ने दोहराया कि कानून सबके लिए समान है। मुख्यमंत्री का पद भी कानून से ऊपर नहीं है। कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि सरकार कानून के शासन में विश्वास करती है और मर्यादा व व्यवस्था बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि एक जिम्मेदार और मर्यादित व्यक्ति कभी इस प्रकार का आचरण नहीं कर सकता। हम मर्यादित लोग हैं, कानून के शासन पर विश्वास करते हैं। कानून के शासन का पालन करना भी जानते हैं, पालन करवाना भी जानते हैं। दोनों चीजों को एक साथ लागू करवाना जानते हैं, लेकिन इसके नाम पर गुमराह करना बंद करिए।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आदि शंकराचार्य ने देश की चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना की थी, उत्तर में ज्योतिष पीठ, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथपुरी और पश्चिम में द्वारिकापुरी। इन चारों पीठों की अपनी-अपनी परंपरा, दायित्व और आध्यात्मिक आधार हैं। इन पीठों से चार वेद जुड़े हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। प्रत्येक वेद का अपना महावाक्य है- “प्रज्ञानं ब्रह्म”, “अहम् ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” और “अयमात्मा ब्रह्म”। ये महावाक्य भारतीय दर्शन की आत्मा हैं और साधना की उच्चतम अवस्था का बोध कराते हैं। मैं ही ब्रह्म हूं, कोई भी साधक जब अपनी साधना की पराकाष्ठा में पहुंचता है तो उसको इस बात की अनुभूति होती है। यही उपनिषदों का उद्घोष भी है। 

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झूठ को मुद्दा बनाना विपक्ष की प्रवृत्ति
मुख्यमंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह बार-बार एक ही बात को दोहराकर उसे मुद्दा बनाने का प्रयास करता है। उन्होंने कहा कि जो विषय वास्तविक मुद्दा नहीं था, उसे जानबूझकर विवाद का रूप दिया गया। सदन में तथ्यात्मक चर्चा होनी चाहिए, न कि भ्रम फैलाने का प्रयास।