राजस्थान के वो पकवान जो दाल बाटी से भी ज्यादा मशहूर हैं

जब भी राजस्थान के खाने का नाम आता है, तो हम सबके दिमाग में सबसे पहले दाल-बाटी-चूरमा ही आता है। लेकिन राजस्थान की असली रसोई इससे कहीं ज्यादा बड़ी और चटखारेदार है। रेगिस्तान की इस तपती रेत और कंटीली झाड़ियों के बीच यहां के लोगों ने स्वाद का ऐसा जादू रचा है, जो बड़े-बड़े शेफ की डिशेज को भी फेल कर देता है। आज हम आपको दाल-बाटी से हटकर उन पकवानों के बारे में बताएंगे, जिनका नाम सुनते ही आपके मुंह में पानी आ जाएगा।
रेगिस्तान की केर सांगरी

रेगिस्तान में जहां दूर-दूर तक हरियाली नहीं दिखती, वहां केर और सांगरी कुदरत के किसी वरदान से कम नहीं हैं। खेजड़ी के पेड़ की लंबी फलियां (सांगरी) और छोटे गोल फल (केर) को सुखाकर यह सब्जी बनाई जाती है। इसे दही और राजस्थानी मसालों के साथ पकाया जाता है। खास बात ये है कि यह सब्जी हफ्तों तक खराब नहीं होती। इसका खट्टा-तीखा स्वाद इतना लाजवाब होता है कि इसके आगे बाकी सब वेस्टर्न सब्जियां फेल है।
राजस्थान में सफेद मांस के दीवाने

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आपने लाल मांस के बारे में तो बहुत सुना होगा, लेकिन क्या कभी सफेद मांस ट्राई किया है? यह राजस्थान की बहुत ही रॉयल डिश है। जहां लाल मांस तीखा और चटपटा होता है, वहीं सफेद मांस एकदम मखमली और शाही होता है। इसे काजू, बादाम, क्रीम और दही की ग्रेवी में धीमी आंच पर पकाया जाता है। इसमें मिर्ची बहुत कम होती है और स्वाद में थोड़ी मिठास होती है। जो लोग तीखा नहीं खाते, उनके लिए ये सबसे बेस्ट है।
शिकार से शुरू हुआ लाल मांस

लाल मांस का इतिहास राजा-महाराजाओं के शिकार से जुड़ा है। पुराने समय में जब राजा जंगल में शिकार पर जाते थे, तो वहां साथ में ज्यादा मसाले नहीं ले जा सकते थे। तब लाल मिर्च, लहसुन और दही के साथ शिकार किए गए मांस को पकाया जाता था। मिर्च का इस्तेमाल इसलिए ज्यादा होता था ताकि मांस की स्मेल कम हो सके। आज भी इसे असली घी में पकाने की परंपरा है, जिसका रंग देखते ही भूख लगने लगती है।

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