चुनाव आयोग पर भड़का कलकत्ता हाईकोर्ट, तुगलकी फरमान पर सुनाई कड़ी फटकार

कलकत्ता 

पश्चिम बंगाल में पहले चरण की वोटिंग के दिन यानी गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग की जमकर क्लास लगाई. हाईकोर्ट ने बुधवार को भी आयोग को फटकार लगाई थी. गुरुवार को हाईकोर्ट ने कोलकाता और दक्षिण 24 परगना में मोटरबाइकों पर 48 घंटे की पाबंदी लगाने के आदेश को तुगलकी फरमान करार देते हुए इसे नागरिक अधिकारों के खिलाफ बताया. गुरुवार को सुनवाई के दौरान जस्टिस कृष्णा राव ने चुनाव आयोग को फटकार लगाते हुए कहा कि सिर्फ अधिकार होना किसी भी तरह के आदेश लागू करने का आधार नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि अगर आप सब कुछ बंद करना चाहते हैं तो आपातकाल घोषित कर दीजिए, लेकिन इस तरह नागरिकों के अधिकारों पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. इससे पहले बुधवार को भी हाईकोर्ट ने चुनाव को झटका दिया था. उसने राज्य में आयोग की ओर से करीब 800 लोगों को उपद्रवी करार देने के फैसले को पटल दिया था।

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रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयोग ने 21 अप्रैल को एक अधिसूचना जारी कर 27 अप्रैल शाम 6 बजे से 29 अप्रैल तक मोटरसाइकिलों के उपयोग पर सख्त प्रतिबंध लगाया था. आदेश के अनुसार इस दौरान बाइक केवल सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक ही चलाई जा सकती थी. इसके अलावा पिलियन राइडिंग (पीछे बैठकर सफर) और बाइक रैलियों पर भी रोक लगा दी गई थी. हालांकि मेडिकल इमरजेंसी, पारिवारिक कार्यक्रम और आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई थी

आयोग ने बचाव में कही ये बातें
चुनाव आयोग ने अपने आदेश का बचाव करते हुए कहा था कि यह कदम स्वतंत्र, निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव सुनिश्चित करने तथा किसी भी तरह की हिंसा, डराने-धमकाने या अवांछित घटनाओं को रोकने के लिए उठाया गया है. आयोग का मानना था कि इस तरह के प्रतिबंध से मतदान का माहौल बेहतर और सुरक्षित बनेगा. लेकिन, अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं था. जस्टिस राव ने सुनवाई के दौरान आयोग के वकील से सवाल किया कि क्या अन्य राज्यों में भी इस तरह के आदेश जारी किए जाते हैं. उन्होंने कहा कि आपके पास पुलिस व्यवस्था और सीसीटीवी कैमरे हैं, फिर इतनी कड़ी पाबंदी की जरूरत क्यों? यह एक असंगत प्रयास है जिससे सब कुछ ठप करने की कोशिश हो रही है

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आयोग से हाईकोर्ट के तीखे सवाल
अदालत ने यह भी पूछा कि पिछले पांच वर्षों में मोटरसाइकिल चालकों के खिलाफ कितने मामले दर्ज हुए हैं, जिससे यह साबित हो सके कि ऐसा प्रतिबंध आवश्यक था. साथ ही आयोग को निर्देश दिया गया कि वह शुक्रवार तक शपथपत्र (एफिडेविट) दाखिल कर इस फैसले के पीछे की ठोस वजह बताए. हाईकोर्ट की इस सख्ती के बाद राज्यभर में दोपहिया वाहन चालकों ने राहत की सांस ली है. खासकर कोलकाता के मध्यवर्गीय नागरिकों और गिग इकॉनमी से जुड़े लोगों के लिए यह फैसला बड़ी राहत लेकर आया है।

शहर के कई प्रमुख चौराहों पर बाइक सवारों ने कहा कि अदालत ने वही सवाल उठाए हैं, जो वे अधिसूचना जारी होने के बाद से पूछ रहे थे. विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव के दौरान सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए ऐसे कदम उठाना जो आम नागरिकों के दैनिक जीवन को बुरी तरह प्रभावित करें, उचित नहीं है. अदालत ने भी स्पष्ट किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी प्रशासन की है, न कि आम जनता पर अत्यधिक प्रतिबंध लगाकर समस्या का समाधान किया जाए।

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