क्या टीम इंडिया की टी20 योजनाओं में संजू सैमसन अब सिर्फ स्टेपनी बनकर रह गए?

नई दिल्ली
भारतीय क्रिकेट में संजू सैमसन का नाम हमेशा उन खिलाड़ियों में लिया जाएगा, जिनकी प्रतिभा पर शायद ही कभी किसी ने सवाल उठाया हो. लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि उनके अंतरराष्ट्रीय करियर के साथ हमेशा 'अगर' और 'मगर' जुड़े रहे. कभी टीम में जगह नहीं मिली, कभी लगातार मौके नहीं मिले और जब मिले तो टीम का संयोजन बदल गया. अब एक बार फिर घटनाक्रम ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संजू सैमसन टीम इंडिया की टी20 योजनाओं से धीरे-धीरे बाहर होते जा रहे हैं या फिर वह सिर्फ एक 'स्टेपनी' बनकर रह गए हैं.

सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि सिर्फ चार महीने पहले तस्वीर बिल्कुल अलग थी. संजू सैमसन न सिर्फ टी20 विश्व कप जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा थे, बल्कि 'प्लेयर ऑफ द सीरीज' भी चुने गए थे. उस समय वह टीम इंडिया की सफलता के बड़े नायकों में गिने जा रहे थे. लेकिन सिर्फ चार महीने बाद तस्वीर बदलती नजर आ रही है. इंग्लैंड टी20 सीरीज में बीच में प्लेइंग इलेवन से बाहर होना, आखिरी मैच में मौका मिलना और फिर जिम्बाब्वे दौरे के लिए घोषित टीम में जगह नहीं मिलना इस ओर इशारा करता है कि फिलहाल वह टीम मैनेजमेंट की पहली पसंद नहीं हैं. यही वजह से सवाल उठ रहा है कि क्या संजू अब टीम इंडिया के लिए सिर्फ एक बैकअप यानी 'स्टेपनी' बनकर रह गए हैं.

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इंग्लैंड दौरे से शुरू हुआ बड़ा सवाल
इस सवाल की शुरुआत इंग्लैंड दौरे से होती है. भारत की टी20 टीम शुरुआती मुकाबलों में बुरी तरह पिछड़ चुकी थी और सीरीज हाथ से निकल चुकी थी. ऐसे समय में संजू सैमसन को प्लेइंग इलेवन में वापस लाया गया. पहली नजर में यह फैसला सकारात्मक लगा, लेकिन अगर घटनाक्रम को थोड़ा गहराई से देखें तो यह सवाल भी उठता है कि जब टीम सीरीज गंवा चुकी थी, तभी संजू की याद क्यों आई? अगर टीम मैनेजमेंट वास्तव में उन्हें अपनी भविष्य की योजनाओं का अहम हिस्सा मानता, तो क्या उन्हें शुरुआत से ही लगातार मौके नहीं मिलने चाहिए थे?

यह भी संभव है कि टीम प्रबंधन सभी विकल्पों को आजमाना चाहता हो. लेकिन एक दूसरा पहलू भी है. संजू को लेकर सोशल मीडिया पर लंबे समय से बहस चलती रही है. हर बार उनके बाहर होने पर चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट पर सवाल उठते हैं. ऐसे में इंग्लैंड सीरीज में उन्हें मौका देना उन आलोचनाओं को कुछ समय के लिए शांत करने की कोशिश भी माना जा सकता है.

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हालांकि, सबसे बड़ा संकेत जिम्बाब्वे दौरे के लिए घोषित टीम से मिला. इंग्लैंड सीरीज के बीच ही तीन टी20 मैचों की इस सीरीज के लिए भारतीय टीम का ऐलान हुआ, लेकिन उसमें संजू सैमसन का नाम नहीं था. दूसरी ओर, वैभव सूर्यवंशी को एक बार फिर मौका मिला. इससे साफ संकेत मिला कि चयनकर्ता भविष्य की टीम तैयार करने पर ज्यादा जोर दे रहे हैं.

जिम्बाब्वे दौरा बताता है टीम इंडिया का रोडमैप
जिम्बाब्वे दौरे जैसी सीरीज में अक्सर नए खिलाड़ियों को मौका दिया जाता है. ऐसे दौरे अनुभवी खिलाड़ियों को भी लय हासिल करने का अवसर देते हैं. ऐसे में अगर चयनकर्ता संजू को अपनी लंबी योजना का हिस्सा मानते, तो उन्हें भी इस टीम में जगह मिल सकती थी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि चयनकर्ताओं की प्राथमिकता अब नई पीढ़ी तैयार करना है.

वैभव सूर्यवंशी पर टीम मैनेजमेंट का भरोसा साफ दिखता है. जिम्बाब्वे दौरे के लिए टीम का ऐलान इंग्लैंड सीरीज के दौरान ही हुआ और उसमें वैभव को जगह मिली, जबकि संजू सैमसन को नहीं. इससे यही संदेश जाता है कि चयनकर्ता युवा खिलाड़ियों पर लंबी अवधि का दांव लगाने के लिए तैयार हैं.

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यानी एक खिलाड़ी भविष्य की योजना का हिस्सा है, जबकि दूसरे को जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल होने वाले विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.

क्या संजू के लिए अभी भी खुला है वापसी का रास्ता?
क्या इसका मतलब यह है कि संजू सैमसन का अंतरराष्ट्रीय करियर खत्म हो गया है? अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी. क्रिकेट में परिस्थितियां बहुत तेजी से बदलती हैं. चोट, खराब फॉर्म या टीम संयोजन में बदलाव किसी भी खिलाड़ी के लिए वापसी का रास्ता खोल सकते हैं.

लेकिन मौजूदा तस्वीर यही कहती है कि टीम इंडिया की टी20 रणनीति अब भविष्य की ओर बढ़ चुकी है. चयनकर्ता उन खिलाड़ियों में निवेश करना चाहते हैं, जिन्हें अगले पांच से सात वर्षों तक भारतीय क्रिकेट की रीढ़ बनाया जा सके. ऐसे में संजू सैमसन फिलहाल उस योजना के केंद्र में नजर नहीं आते.

फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि संजू सैमसन टीम इंडिया की पहली पसंद नहीं हैं. उन्हें तब मौका मिलता है, जब टीम को किसी विकल्प की जरूरत होती है. यही वजह है कि उनके प्रदर्शन से ज्यादा उनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. मौजूदा हालात में वह नियमित सदस्य से ज्यादा एक 'स्टेपनी' की तरह नजर आते हैं.