वास्तु शास्त्र के अनुसार घर के निर्माण में पंचतत्वों का महत्व, जानिए दोष निवारण के सरल ज्योतिषीय और घरेलू उपाय

वास्तु शास्त्र के अनुसार घर का निर्माण करते समय सौ प्रतिशत वास्तु सम्मत नियमों का पालन करना कठिन रहता है, अतः अधिक से अधिक शुभ निर्माण वास्तु नियमों के अनुसार करने का प्रयास करना चाहिए। ब्रह्म स्थान को लेकर पूर्व दिशा, पश्चिम दिशा, उत्तर दिशा, दक्षिण दिशा, ईशान कोण, अग्नि कोण, नैऋत्य कोण, वायव्य कोण, इन नौ दिशा रूपी बिन्दुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है, ताकि भवन को अधिक से अधिक वास्तु अनुरूप बनाया जा सके।
माना कि किसी भी मकान आदि का छः भाग वास्तु अनुरूप है एवं तीन भाग वास्तु दूषित है, तो अधिक फल लाभ का मिलेगा, लेकिन शर्त इतनी है कि तीन दूषित भागों के दोषों का निवारण वास्तु सम्मत उपायों से अवश्य करें। फेंगशुई के उपाय, ग्रह उपचार, वास्तु उपायों के साथ करने पर दोष निवारण को न्यूनतम कर जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।

वास्तु दोष निवारण के लिए प्रमुख बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जैसे ब्रह्म स्थान का शुद्ध होना, प्रवेश द्वार की स्थिति, ईशान कोण, अग्नि कोण, नैऋत्य कोण, वायव्य कोण, चारों कोेणों का घटना-बढ़ना एवं उसमें क्या सही और क्या गलत निर्माण हो चुका है, इन सब पर ध्यान देना। सीढ़ियों की दिशा एवं संख्या को ध्यान में रखना, रसोईघर, स्नानघर, शौचालय की स्थिति, पानी की टंकी आदि का ध्यान रखना, शयन कक्ष का कमरा, शयन कक्ष में फर्नीचर की स्थिति इत्यादि बातों पर गौर करना आवश्यक है।
घर में पंच तत्वों की स्थिति
पांच तत्वों की मकान में अलग-अलग स्थिति रहती है। ईशान कोण में जल तत्व, अग्नि कोण के मालिक पितृ एवं अग्निदेव, नैऋत्य कोण विघ्नों की राक्षसी दिशा, वायव्य कोण में वायु तत्व, ब्रह्म स्थान में आकाश तत्व, इस प्रकार पंचतत्व को वास्तु कुण्डली बनाकर समायोजन करना आवश्यक रहता है। यह कार्य कोई विशेष वास्तु मर्मज्ञ ही कर सकता है।

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ईशान कोण का दोष दूर करने के उपाय
ईशान कोण का दोष न्यूनतम करने के लिए इस कोण पर जल पात्रों को स्थापित करना, भगवान शिव का चित्र, शिव ध्वजा लगाना दोष दूर करने का सरल माध्यम है। इसी प्रकार अग्नि कोण में बैठकर अग्निदेव का ध्यान कर अपने पूर्वजों के निमित्त दान, पूजा, सूर्य व गायत्री उपासना एवं नित्य अग्निहोम करने से अग्निकोण का वास्तुदोष न्यूनतम हो जाता है। नैऋत्य कोण की अधिष्ठात्री नैऋति देवी को माना गया है, अतः इनके ध्यान के साथ गरीबों की सेवा और मदद करने से आत्मरक्षा होती है। भैरव उपासना दक्षिण व नैऋत्य दोष निवारण हेतु शुभ मानी गई है। वास्तु उपासना के साथ वास्तु यंत्र को घर में स्थापित करना लाभप्रद रहता है।