जीव-जन्तु, वनस्पति, प्राणिजगत, जैवविविधता और पर्यावरण के लिए घातक है गाजर घास

मिट्टी के सबसे बड़े दुश्मन ‘गाजर घास’ को वैज्ञानिकों ने धरती के लिए विनाशकारी पाया है। जीव-जन्तु हों या वनस्पति, गाजर घास पूरे प्राणिजगत, जैवविविधता और पर्यावरण के लिए घातक है। लिहाज़ा, गाँव हो या शहर, जहाँ भी आपको गाजर घास नज़र आये, फ़ौरन पूरी ताक़त से इसके ज़हरीले पौधों का समूल नाश करने का बीड़ा उठाएँ, क्योंकि ये आक्रामक ढंग से फैलती है और ऐसे ज़हरीले रसायनों का स्राव करती है जिससे ज़मीन बंजर हो जाती है।

दुनिया के क़रीब 20 देशों में ज़हरीले खरपतवार, गाजर घास का प्रकोप है। ये आक्रामक ढंग से फैलती है और ऐसे ज़हरीले रसायनों का स्राव करती है जिससे ज़मीन बंजर हो जाती है। भारत के लिए ये एक घुसपैठिया वनस्पति है। ये हर तरह के वातावरण में तेज़ी से बढ़ती है। माना जाता है कि अमेरिका या कनाडा से आयातित गेहूँ में छिपकर गाजर घास के सूक्ष्म बीज भारत आ घुसे।

देश में पहली बार 1955 में इसे पुणे में देखा गया था। इसने अब तक देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में खेतीहर ज़मीन, रेल की पटरियों के किनारे की खाली पड़ी सरकारी ज़मीन, कॉलेजों-अस्पतालों, खेल के मैदानों, सड़कों के किनारे की खाली जगहों पर अपनी जड़ें ऐसे जमायीं कि अब इसका रक़बा 3.5 करोड़ हेक्टेयर तक फैल चुका है।

ICAR के कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि गाजर घास की वजह से फ़सलों के 40 से 80 प्रतिशत उत्पादन को चपत लग रही है। जीव-जन्तु हों या वनस्पति, गाजर घास पूरे प्राणिजगत, जैवविविधता और पर्यावरण के लिए घातक है। अपनी आक्रामक विस्तार क्षमता की वजह से गाजर घास हरेक फ़सल और अन्य उपयोगी वनस्पतियों को भी ख़त्म कर देती है। इसीलिए इसका सफ़ाया युद्धस्तर पर करना ज़रूरी है।

अनुकूल वातावरण मिलने पर गाजर घास साल भर उगी रहती है। ज़हरीले रसायनों के स्राव के अलावा मिट्टी से पोषक तत्वों और नमी को चूस लेने की क्षमता भी गाजर घास में कई गुना ज़्यादा होती है। मिट्टी से पोषण लेने की प्रतिस्पर्धा में गाजर घास अन्य सभी फ़सलों को पछाड़ देती है। मिट्टी के ऐसे ज़बरदस्त शोषण से वो बंजर हो जाती है। ज़मीन का सत्यानाश करने के दौरान गाजर घास तक़रीबन हरेक फ़सल के उत्पादन को बुरी तरह से प्रभावित करती है। इसकी रोकथाम का खर्च ज़्यादा होने से खेती की लागत बढ़ जाती है और किसानों को बहुत नुकसान होता है।

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गाजर घास के विषाक्त पदार्थ का प्रकोप धान, ज्वार, मक्का, सोयाबीन, मटर तिल, अरंडी, गन्ना, बाजरा, मूँगफली, सब्जियों और फलों की फ़सलों के अंकुरण और वृद्धि पर देखा गया है। ये दलहनी फ़सलों में जड़ ग्रन्थियों के विकास को प्रभावित करता है। इससे नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की क्रियाशीलता घट जाती है। गाजर घास के परागकण बैंगन, मिर्च, टमाटर आदि सब्जियों के पौधे पर एकत्रित होकर उनके परागण, अंकुरण और फल विन्यास को प्रभावित करते हैं तथा पत्तियों में क्लोरोफिल की कमी और फूलों में विकृति पैदा करते हैं।

गाजर घास से मनुष्य में त्वचा सम्बन्धी रोग जैसे डरमेटाइटिस, एक्जिमा, एलर्जी, दमा और बुख़ार आदि का सबब बनती है। इसका अत्यधिक प्रभाव होने पर मनुष्य की मौत भी हो सकती है। पशुओं के लिए भी ये विषैला खरपतवार अत्यधिक नुकसानदायक है। यदि पशु इसे खा ले तो उसके मुँह में अल्सर हो जाता है, त्वचा पर धब्बे उभर आते हैं और आँखों से पानी तथा मुँह से ज़्यादा लार बहने लगता है। इसे खाने से दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट आने लगती है। गाजर घास को ज़्यादा मात्रा में पशु को खिलाने से उसकी मौत भी हो सकती है।

गाजर घास की 20 प्रजातियाँ हैं। यह सफ़ेद फूलों वाली क़रीब 1 मीटर ऊँची और विदेशी खरपतवार है। ये अमेरिका, मैक्सिको, वेस्टइंडीज, भारत, चीन, नेपाल, वियतनाम और आस्ट्रेलिया में पायी जाती हैं। भारत में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओड़ीशा, पश्चिमी बंगाल, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड के विभिन्न भागों में फैली हुई है।

इसका वानस्पतिक नाम ‘पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस’ (Parthenium hysterophorus) है। इसे काँग्रेस घास, सफ़ेद टोपी, चटक चाँदनी, गन्धी बूटी, चिड़िया बाड़ी आदि भी कहते हैं। इसकी पत्तियाँ गाजर या गुलदाउदी की पत्तियों जैसी होती हैं। इसका तना रोयेंदार और अत्यधिक शाखाओं वाला होता है। इसका जमाव वर्षा काल में अधिक होता है। इसका जीवन चक्र क़रीब 4 महीने का होता है लेकिन अनुकूल वातावरण में ये पूरे साल हरी-भरी रहती है। गाजर घास का हरेक पौधा 5000 से लेकर 25000 तक सूक्ष्म बीज पैदा करता है। इसके बीज वर्षों तक ज़मीन में पड़े रहते हैं और धूप तथा नमी पाकर आसानी से अंकुरित हो जाते हैं।

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फ़सलों के बीजों, सिंचाई, खाद, हवा, बारिश, मड़ाई और यातायात के साधनों से एक जगह से दूसरी जगह पर पहुँचते और पनपते रहते हैं। किसी फ़सल के आसपास यदि गाजर घास का प्रकोप हो और वहाँ यदि फ़सल की कटाई और मड़ाई को सावधानीपूर्वक नहीं किया जाए तो गाजर घास के बीज उपज के ज़रिये अन्य खेतों तक पहुँच जाते हैं। गाजर घास नहरों के किनारों पर बहुतायत से देखी जाती है। नहर या नालियों में उगी गाजर घास के बीज पकने के बाद वहीं गिर जाते हैं और सिंचाई के पानी के साथ खेतों में पहुँच जाते हैं।

इसी तरह अनेक खरपतवारों से जब किसान खाद बनाते हैं तब उनमें छिपकर भी गाजर घास के बीज खेतों तक पहुँच जाते हैं। इस घास से प्रभावित चारागाह में पशुओं के चरने के दौरान उनके ज़रिये भी गाजर घास के बीज एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँच जाते हैं। तेज़ हवा का झोंका भी गाजर घास के सूक्ष्म और हल्के बीजों को कहीं से कहीं पहुँचा देता है। गाजर घास से प्रभावित फ़सल की मड़ाई कराने के बाद यदि मशीन को अच्छी तरह से साफ़ नहीं किया जाए तो भी इसके बीजों के दूसरे बीजों के साथ मिलने की आशंका रहती है।

गाजर घास से मुक्ति कैसे पाएँ?

मिट्टी को गाजर घास से मुक्त रखने के लिए सामुदायिक प्रयास बहुत ज़रूरी है। जहाँ गाजर घास पनपती दिखे वहाँ सामुदायिक अभियान चलाकर इसे समूल नष्ट करना चाहिए। गाजर घास को समूल नष्ट करने का सबसे बढ़िया उपाय है- वर्षा ऋतु में फूल आने से पहले इसके पौधों को जड़ से उखाड़कर नष्ट कर देना। पौधों को उखाड़ने के लिए खुरपी का इस्तेमाल कर सकते हैं। यदि पौधे को हाथ से खींचकर ज़मीन से उखाड़ना हो तो ऐसा करते वक़्त दस्ताने ज़रूर पहनना चाहिए। ताकि शरीर का कोई अंग इसके सम्पर्क में नहीं आये।

जैविक नियंत्रण: गर्मी के दिनों में फ़सल की कटाई होने के बाद खाली पड़ी भूमि की कल्टीवेटर से दो-तीन जुताई कर देनी चाहिए। ताकि बीज समेत तमाम खरपतवार पूरी तरह से नष्ट हो जाएँ। घर के आसपास और संरक्षित क्षेत्रों में गेन्दे के पौधे लगाकर भी गाजर घास के फैलाव और वृद्धि को रोका जा सकता है। इसकी रोकथाम ‘मैक्सिकन बीटल’ नामक कीट से भी हो सकती है, जो सिर्फ़ गाजर घास ही खाता है और डेढ़-दो महीने पूरा पौधा खा लेता है। इसीलिए जहाँ गाजर घास का प्रकोप ज़्यादा हो वहाँ 500 से 1000 वयस्क बीटल छोड़ देना चाहिए। इस बीटल की प्रजनन क्षमता अपार होती है। इनकी आबादी बहुत तेज़ी से बढ़ती है। इससे गाजर घास का टिकाऊ समाधान हो जाता है।

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रासायनिक नियंत्रण: खरपतवारनाशक रसायनों के ज़रिये भी गाजर घास को ख़त्म किया जा सकता है। खाली खेतों में गाजर घास पनपने की शुरुआती अवस्था में जब पौधे 2-3 पत्तियों वाले हों तब ग्लाइफोसेट 1.5 से 2.0 प्रतिशत अथवा मेट्रीब्यूजिन 0.3 से 0.5 प्रतिशत अथवा 2.4-डी 0.5 किलोग्राम सक्रिय तत्व का 500-600 लीटर पानी में घोल बनाकर और फूल आने के पहले छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव करते समय ध्यान रहे कि पौधे घोल से अच्छी तरह भीग जाएँ अन्यथा अनुकूल नतीज़ा नहीं मिलेगा।

गाजर घास का सदुपयोग

गाजर घास का उपयोग अनेक कीटनाशक, जीवाणुनाशक और खरपतवार नाशक दवाइयों के निर्माण में किया सकता है। इसकी लुग्दी से विभिन्न प्रकार के काग़ज़ तैयार किये जा सकते हैं। गोबर के साथ मिलाकर इससे बायोगैस उत्पादन का काम लिया जा सकता है। इसी तरह फ़सल और मिट्टी को बर्बाद करने वाली और सभी प्राणियों की दुश्मन गाजर घास को यदि किसान, कम्पोस्ट या वर्मीकम्पोस्ट बनाने में इस्तेमाल करें तो ये आमदनी बढ़ाने वाला दोस्त भी बन सकता है।

गाजर घास से बनाएँ कम्पोस्ट

गाजर घास से कम्पोस्ट खाद बनाने के लिए एक आयताकार गड्ढा बनाया जाता है। इसमें सूखी और हरी गाजर घास तथा गोबर को डाला जाता है। साथ ही अन्य अवशिष्ट पदार्थ का भी उपयोग किया जा सकता है। इसके बाद दो इंच तक मिट्टी डाली जाती है। यह प्रक्रिया गड्डा भरने तक दोहरायी जाती है। छह महीने में गड्ढे में कम्पोस्ट खाद तैयार हो जाती है। इसे यदि 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें तो ये रासायनिक खाद से बेहतर साबित हुई। इससे धान की पैदावार में 20 प्रतिशत तक का इज़ाफ़ा देखा गया।