दक्षिण भारत की गाय माता नहीं उसे खा सकते हैं, उसे मारने में कोई पाप नहीं : बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का “केवल भारतीय गाय ही गौ माता है” वाला बयान अब एक सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं रह गया है। यह बयान देश में गाय, आस्था और राजनीति को लेकर चल रही बहस को एक नए और विवादास्पद मोड़ पर ले आया है। खासतौर पर तब, जब इस बयान के समर्थन में दी गई दलीलें खुद कई सवाल खड़े कर रही हैं।

 

सुधांशु त्रिवेदी के अनुसार नॉर्थ ईस्ट और साउथ इंडिया में जिस गाय को खाया जाता है वह मिथुन प्रजाति की है, जिसे वैज्ञानिक रूप से बोस फ्रंटैलिस कहा जाता है। उनका तर्क है कि उत्तर भारत में पाई जाने वाली गाय बोस इंडिकस प्रजाति की है और केवल वही गौ माता मानी जानी चाहिए। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने कहा कि नॉर्थ ईस्ट में खाई जाने वाली गाय गौ माता नहीं है।

 

इस दलील को आगे बढ़ाते हुए यह सवाल भी स्वतः खड़ा हो गया कि यदि प्रजाति ही मापदंड है, तो यूरोप में पाई जाने वाली जर्सी और अन्य गायें जो बोस टॉरस प्रजाति की हैं, क्या वे भी गौ माता नहीं होंगी। जबकि देश की डेयरी व्यवस्था का बड़ा हिस्सा इन्हीं प्रजातियों पर निर्भर है।

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यहीं से बहस और उलझती है। उत्तर भारत में ही साहीवाल, राठी, कांकरेज, थारपारकर, गीर जैसी कई देसी प्रजातियां मौजूद हैं। सवाल उठ रहा है कि इनमें से माता योग्य कौन सी मानी जाएगी और किस आधार पर। क्या आस्था अब नस्ल प्रमाण पत्र देखकर तय होगी।

कुतर्क का आरोप और राजनीतिक बचाव

आलोचकों का कहना है कि जब इंसान कुतर्क पर उतर आता है तो किसी भी बात को सही ठहराया जा सकता है। सोशल मीडिया और राजनीतिक विश्लेषणों में यह आरोप खुलकर लगाया जा रहा है कि यह पूरा तर्क दरअसल उन असहज सवालों से बचने का तरीका है, जिनका जवाब भाजपा के पास नहीं है।

बीफ पर दोहरा रवैया

सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह उठाया जा रहा है कि यदि भाजपा वास्तव में बीफ के खिलाफ है, तो नॉर्थ ईस्ट से लेकर गोवा तक उसकी सरकारें और उसके नेता बीफ के समर्थन में क्यों नजर आते हैं। क्यों वहां बीफ पर न तो सख्त कानून बनते हैं और न ही वैसा विरोध होता है जैसा उत्तर भारत में दिखाया जाता है। इसी सवाल पर सुधांशु त्रिवेदी के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं बताया जा रहा है।

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मिथुन और जर्सी से इनकार, नीलगाय पर चुप्पी

इस पूरे विमर्श में यह भी नोट किया जा रहा है कि सुधांशु त्रिवेदी ने मिथुन और जर्सी प्रजाति को गौ माता मानने से साफ इनकार कर दिया, लेकिन नीलगाय पर कोई चर्चा नहीं की। जबकि नीलगाय देश के लगभग हर हिस्से में पाई जाती है और नाम में गाय होने के बावजूद उसे न तो धार्मिक विमर्श में जगह मिलती है और न ही राजनीतिक बहस में।

जाति और प्रजाति से परे आस्था का सवाल

आलोचकों का कहना है कि गाय का सम्मान यदि सच में आस्था का विषय है, तो उसे जाति, प्रजाति और भूगोल से ऊपर रखा जाना चाहिए। जाति और प्रजाति के आधार पर भेद करना उसी सोच को आगे बढ़ाता है, जिससे देश पहले ही जूझ रहा है।

 असल सवाल अब भी कायम

इस पूरे विवाद ने राष्ट्रीय स्तर पर एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है।

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क्या गौ माता की परिभाषा राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से बदली जाएगी।

क्या आस्था को वैज्ञानिक नामों और प्रजातियों में बांटा जाएगा।

और क्या गाय का मुद्दा सिर्फ बहस और बयान तक सीमित रहेगा या उसकी वास्तविक स्थिति पर भी कभी गंभीर चर्चा होगी।

 

 

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