दहेज प्रताड़ना पर हाईकोर्ट का आदेश : पीड़िता जिस थाना क्षेत्र में निवास करती है वही होगी एफआईआर

JJohar36garh News|हाईकोर्ट ने दहेज प्रताड़ना के मामले में एफआईआर के स्थानांतरण की याचिका पर महत्वपूर्ण आदेश दिया। अब जीरो में एफआईआर नहीं होगा साथ ही महिला जिस थाने में एफआईआर दर्ज कराती है उस थाने के अधिकारी को जांच करने का अधिकार है। यह आदेश राज्य के सभी जिलों में लागू होगा। कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि वे सभी एसपी कार्यालय में आदेश की कॉपी भेजें और पुलिस अधिकारियों को प्रशिक्षित करें, जिससे वे शून्य के बजाय सीधे एफआईआर करें।

सुनवाई जस्टिस संजय के अग्रवाल की बेंच में हुई। रायगढ़ की प्रीति शर्मा ने अपने अधिवक्ता हरि अग्रवाल के माध्यम से याचिका दायर की थी। उनकी शादी 2016 में रायगढ़ में ही हुई। शादी के बाद ससुराल के लोग प्रताड़ित करने लगे साथ ही ससुराल से निकाल दिए। इसके बाद से वह अपने माता-पिता के घर रह रही हैं। उन्होंने सिटी कोतवाली रायगढ़ में 498 के तहत एफआईआर दर्ज कराई। पुलिस जांच करने के बजाय शून्य में एफआईआर दर्ज कर अन्य कार्रवाई के लिए सक्ती थाना भेज दिया।

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अधिवक्ता ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को थाने व कोर्ट में बयान व सुनवाई के दौरान वहीं जाना पड़ेगा जहां उसका ससुराल है। वह और उत्पीड़ित होगी। सक्ती थाने से एफआईआर को रायगढ़ थाने में स्थानांतरण की मांग की। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के 2019 में रुपाली देवी के मामले में पारित सिद्धांत भी प्रस्तुत की। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि महिला जब घर से बाहर निकाल दी जाती है और वह जहां आश्रय लेती है वहां 498(ए) दर्ज कराती है तो उस क्षेत्र के कोर्ट को क्षेत्राधिकार होता है।

बिलासपुर रेंज में पिछले पांच साल में दहेज प्रताड़ना के 67 मामले जीरो में कायम किए गए। सात जिलों में बिलासपुर में सबसे अधिक 35 केस दर्ज हुए7 इसके बाद रायगढ़ कोरबा जांजगीर तीन ऐसे जिले हैं जहां 2016 से अब तक बरामद9-9 मामले रजिस्टर्ड हुए।

दहेज प्रताड़ना कानून पर उठते रहे हैं सवाल : कानूनविद अजय अयाची के अनुसार इस कानून पर सवाल उठते रहे हैं।2003 में दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन जस्टिस जेडी कपूर ने कहा था कि ऐसी प्रवृत्ति पैदा हो रही है कि लड़की न सिर्फ पति बल्कि उसके रिश्तेदारों को भी मामले में लपेट लेती है। इस वजह से शादी की बुनियाद हिल रही है और समाज के लिए यह सही नहीं है।

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2017 में सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की बेंच ने फैसले में धारा-498 ए में सीधे गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी। जिले में परिवार कल्याण समिति बनाने और समिति की रिपोर्ट आने के बाद ही गिरफ्तार करने के लिए कहा गया था। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के के तीन जजों की कोर्ट ने सिविल सोसायटी की कमेटी बनाने की गाइडलाइन को हटा दिया है। इससे गिरफ्तारी तय करने का अधिकार पुलिस को वापस मिल गई।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि महिला के साथ शारीरिक हिंसा भले ही कहीं हुई हो, लेकिन मानसिक उत्पीड़न उसके साथ-साथ चलती रहती है। इसलिए जहां भी महिला एफआईआर दर्ज कराए वहां की पुलिस ही मामले की जांच करे। पीड़िता जिस थाना क्षेत्र में निवास करती है उसी थाने की पुलिस मामले की विवेचना करेगी।