राष्ट्रीय डॉक्टर डे : अदृश्य दुश्मनों से लड़ने वाले योद्धाओं को सलाम

Johar36garh (Web Desk)|कोरोना काल के दौरान देश में अगर किसी योद्धा का नाम लिया जायेगा तो उसमे सबसे पहले डॉक्टर का नाम सामने आएगा|  जिन्होंने भारत देश में फैली महामारी को रोकने के लिए अपना घर परिवार सब छोड़कर महीनों से लड़ रहे हैं| जिसका ही परिणाम है की लोग बड़ी संख्या में स्वास्थ्य होकर घर लौट रहे हैं |  Johar36garh.com News परिवार इन सभी योद्धा को तहेदिल से सलाम करता है |

जांजगीर जिला के डॉक्टर कोरोना काल से ही अलर्ट मूड में रही है| सरकार जहाँ सभी लोगों को घर से निकलने पर प्रतिबंध लगा रखा था, उसी दौरान इन सभी के घर में रहने पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था |  यहां काम करने वाले डॉक्टर कई महीनों से अपने परिवार से दूर हैं | केवल मोबाइल से ही परिजनों से बात हो पाती है, अपनों के चेहरे देखना भी नसीब नहीं हो रहा है | किसी का शादी रुका तो कोई अपनों की शादी में बेगाना हो गया| किसी ने अपना जन्मदिन भूला तो किसने ने अपनों का, इसके बाद भी ये डॉक्टर पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने काम को अंजाम दे रहे हैं |

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हर साल 1 जुलाई को देशभर में डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। 1 जुलाई को देश के महान चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री डॉक्टर बिधानचंद्र रॉय (Dr. Bidhan Chandra Roy) का जन्मदिन और पुण्यतिथि होती है। यह दिन उन्हीं की याद में मनाया जाता है।

इसके अलावा यह खास दिन स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले उन तमाम डॉक्टरों को समर्पित है जो हर परिस्थिति में डॉक्टरी मूल्यों को बचाए रखते हुए अपना फर्ज निभाते हुए मरीजों को बेहतर से बेहतर इलाज मुहिया कराते हैं। भारत सरकार ने सबसे पहले नेशनल डॉक्टर डे साल 1991 में  मनाया था।

कैसे हुई नेशनल डॉक्टर डे मनाने की शुरुआत-
भारत में इसकी शुरुआत 1991 में तत्कालिक सरकार द्वारा की गई थी। तब से हर साल 1 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे मनाया जाता है। यह दिन भारत के महान चिकित्सक और पश्चिम बंगाल के दूसरे मुख्यमंत्री को सम्मान और श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिएमनाया जाता है।

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कौन थे डॉक्टर बिधानचंद्र रॉय-
डॉक्टर बिधानचंद्र रॉय का जन्म 1 जुलाई 1882 को बिहार के पटना जिले में हुआ था। डॉ. राय ने कोलकाता में अपनी मेडिकल की शिक्षा पूरी करने के बाद एमआरसीपी और एफआरसीएस की उपाधि लंदन से प्राप्त की। जिसके बाद साल 1911 में भारत में उन्होंने अपने चिकित्सकीय जीवन की शुरुआत की। इसके बाद वो कोलकाता मेडिकल कॉलेज में व्याख्याता बने। वहां से वे कैंपबैल मेडिकल स्कूल और फिर कारमिकेल मेडिकल कॉलेज गए।

इसके बाद उन्होंने राजनीति में कदम रखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य का पद चुना। हालांकि बाद में उन्होंने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री का पद भी संभाला। डॉ. राय को बाद में भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था। उनके दूरदर्शी नेतृत्व के लिए उन्हें पं. बंगाल राज्य का आर्किटेक्ट भी कहा जाता था। 80 वर्ष की आयु में साल 1962 में अपने जन्मदिन के दिन 1 जुलाई को उनकी मृत्यु हो गई।

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