लोक संस्कृति का वैभव लोक जीवन के क्रिया-व्यवहार में परिलक्षित होता है। यदि समग्र रूप से समूचे भारतीय लोक जीवन को देखें तो आँचलिकता व स्थानीयता के आधार पर, चाहे व पंजाब हो, या असम हो, कश्मीर हो या केरल, महाराष्ट्र हो या पश्चिम बंगाल, गुजरात हो या राजस्थान, उत्तरप्रदेश हो या बिहार, उड़ीसा हो छत्तीसगढ़ या अन्य कोई राज्य, सबकी अपनी अलग-अलग लोक संस्कृति है। सबकी लोक संस्कृति का आधार कृषि संस्कृति ही है। कृषि संस्कृति ‘लोक’ का उद्गम है।
छत्तीसगढ़ के लोगो का जीवन कृषि पर ही अवलंबित है। खेती-बाड़ी का कार्य इनकी पूजा है, इनका धर्म है, इनकी प्रकृति है और जहाँ प्रकृति के प्रति लगाव है वहीं जीवन में हरीतिमा है, चाहे यहाँ वन क्षेत्र हो या मैदानी भू-भाग सर्वत्र हरापन है। प्रकति का यह हरापन छत्तीसगढ़ के लोक जीवन में भी पूरी समग्रता के साथ रूपायित होता है। हरेली, भोजली, जँवारा हो या बसंत पंचमी सभी पर्वों में प्रकृति का मनोरम यप और इसका अप्रतिम सौंदर्य झलकता है। इस रूप-सौंदर्य में जीवन की चारों अवस्थाओं का उल्लास और उत्साह विविध रंगों में बिखरा हुआ है।
छत्तीसगढ़ सदैव श्रम का पुजारी रहा है, चाहे वह किसान हो या अन्य श्रमिक वर्ग। जहाँ श्रम है, वहीं गान है और जहाँ गान है वहीं प्राण है। श्रम का सीधा संबंध उत्सव और पर्वों से है। ये उत्सव और पर्व हमारी आस्था, श्रद्धा और विश्वास के प्रतीक हैं। साथ ही श्रम के पश्चात शरीर की थकान मिटाने के साधन भी। इन साधनों में खेल और मनोरंजन की भी अपनी महत्ता है। श्रम से क्लांत व्यक्ति मनोरंजन के साधन जुटा ही लेता है, व्यक्तिगत तौर पर या फिर सामुदायिक तौर पर। वैयक्तिकता की अपेक्षा सामुदायिकता में सुख और संतोष की अनुभूति अधिक होती है। यूँ तो वर्ष के प्रारंभ का समय लोग अपने-अपने कार्य व्यापार के हिसाब से मानते हैं, किंतु कृषक जीवन में वर्ष का प्रारंभ आषाढ़ माह से माना जाता है। जब आसमान में काली-काली घटाएँ छा जाती हैं। बिजली चमकती है और रिमझिम पानी बरसने लगता है तो सर्वत्र हरियाली छा जाती है। केवल प्रकृति ही हरी नहीं दिखती, बल्कि मनुष्य का जीवन भी हरा होने लगता है। धरती की देह पर कृषक जब अपने हल रूपी कलम से कर्म की गीता लिखता है तब धरती को एक नैसर्गिक सुख की अनुभूति होती है। खेतों में ददरिया की मधुर तान गूंजती है तब ‘हरियाली’ एक ग्रामीण बाला के रूप में थिरकती है। प्रकृति के इस सौंदर्य की आनंदानुभूति सीमेंट-कांक्रीट के जंगल से नहीं, गांव की दहलीज से ही की जा सकती है।
‘हरेली’ हरियाली का लोक रूप है। यह सावन माह में अमावस्या को मनाई जाती है। जब कृषक की बोनी, बियासी पूरी हो जाती है तब वह अपने कृषि औजारों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा करता है। नांगर, जुड़ा, रापा, कुदारी, चतवार, हंसिया, टंगिया, बसुला, बिंधना आदि उन सभी औजारों की, जो कृषि कार्य कतई संभव नहीं है। हरेली के दिन प्रातः पशुओं को आटे नमक की लोंदी और वनौषधि खिलाई जा है ताकि वे निरोग रहें। कृषि औजारों की पूजा कर उन्हें ‘चीला और सोहारी’ चढ़ाया जाता है, राऊत गाँव में प्रत्येक घर जाकर घर के मुख्य द्वार पर ‘दशमूर’ और नीम की डंगाली खोंचता है। राऊत का यह कार्य उस घर परिवार के लिए निरोग रहने की कामना का प्रतीक है बदले में गृह स्वामिनी उसे ‘सीधा’ के रूप में चांवल, दाल व द्रव्य देती है। यह लोक मंगल की कामना का अद्भूत उदाहरण है। कुल मिलाकर हरेली कृषि संस्कृति का मंगल पर्व है।
परंतु ‘हरेली’ का यह लोक पर्व इतना भर नहीं है। इसमें बाल जीवन व लोक के क्रीड़ा प्रेम की लंबी अनुगूंज गेड़ी के साथ माह भर सुनाई पड़ती है। हरेली के दिन प्रातः काल से बच्चे गेड़ी के लिए लालयित रहते हैं। बच्चे बाँस लेकर गेड़ी बनाने के लिए बड़े बुजुर्गों से मिन्नत करते हैं। तब उन्हें कहा जाता है पूजा होने दो, तब गेड़ी चढ़ना, पर बच्चे तो बच्चे हैं। वे कब मानने वाले है। स्वतः गेंड़ी बनाने भिड़ जाते हैं। गेड़ी के रों हों चों हों स्वर के साथ गाँव की गलियाँ उनकी किलकारियों और गीतों से गूँज उठती है. (दक्षिण कोसल)