हाई कोर्ट का अहम आदेश: न्यायालयों में अधिकारी अब बैठ सकते हैं, अपमानजनक टिप्पणियों पर भी लगेगी रोक

भोपाल
 दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यायालयीन कार्यवाही के दौरान सरकारी अधिकारियों के साथ सम्मानजनक और पेशेवर व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। सरकारी पदाधिकारियों की स्वीय उपसंजाति नियम-2025 के तहत न्यायालय में उपस्थित अधिकारियों को पूरी सुनवाई के दौरान खड़े रहने की बाध्यता नहीं होगी।

न्यायालय के समक्ष उत्तर देते समय अथवा बयान दर्ज कराते समय ही उन्हें खड़े रहना पड़ेगा। हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायालयों को कार्रवाई के दौरान किसी अधिकारी के शारीरिक स्वरूप, शैक्षिक पृष्ठभूमि, सामाजिक स्थिति या परिधान को लेकर अपमानजनक या अनुचित टिप्पणी करने से बचना चाहिए।

अनावश्यक रूप से न्यायालय में तलब न किया जाए

कोर्ट में सम्मान और व्यावसायिकता का वातावरण बनाए रखना अनिवार्य बताया गया है। न्यायालयों में अधिकारियों के सम्मानजनक व्यवहार के तय नए मानकों में कहा गया है कि अधिकारियों को अनावश्यक रूप से न्यायालय में तलब न किया जाए। दरअसल, शासन से जुड़े मामलों में कई बार विभाग के प्रमुख सचिव व राज्य के मुख्य सचिव तक को तलब कर लिया जाता है। नए नियमों के तहत अब आवश्यक होगा तभी उन्हें तलब किया जाएगा।
नए नियम में क्या कहा गया है?

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नए नियम में कहा गया है कि यदि विवाद से जुड़े मुद्दों का समाधान शपथ पत्रों और दस्तावेजों के आधार पर संभव है, तो व्यक्तिगत उपस्थिति को नियमित या सामान्य प्रक्रिया के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए। किसी अधिकारी को केवल उन्हीं मामलों में तलब किया जाना चाहिए, जहां न्यायालय को प्रथम दृष्टया यह प्रतीत हो कि आवश्यक जानकारी नहीं दी जा रही है, तथ्य छुपाएं जा रहे हैं या गलत तरीके से प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इसके लिए सुनवाई से कम से कम एक दिन पहले न्यायालय की रजिस्ट्री या संबंधित जिला न्यायालय द्वारा अधिकारी को ईमेल, एसएमएस या व्हाट्सएप के जरिए लिंक भेजा जाना अनिवार्य होगा। यदि भौतिक उपस्थिति आवश्यक हो, तो इसके कारण आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किए जाएंगे और अधिकारी को पर्याप्त पूर्व सूचना दी जाएगी।
न्यायिक कार्यवाहियों को तीन श्रेणियों में किया वर्गीकृत

हाई कोर्ट ने लंबित मामलों के निपटारे की प्रकृति के आधार पर न्यायिक कार्यवाहियों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया है। पहली श्रेणी साक्ष्य-आधारित मामलों की है, जिनमें दस्तावेज या मौखिक साक्ष्य की आवश्यकता होती है और ऐसे मामलों में संबंधित अधिकारी की भौतिक उपस्थिति आवश्यक हो सकती है।

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दूसरी श्रेणी संक्षिप्त कार्यवाहियों की है, जो मुख्य रूप से शपथ पत्रों और अभिलेखों पर आधारित होती हैं। तीसरी श्रेणी गैर-प्रतिकूल कार्यवाहियों की है, जिनमें नीति या तकनीकी विषयों को समझने के लिए अधिकारियों की उपस्थिति जरूरी हो सकती है।

अवमानना मामलों में संयम बरतने के निर्देश

अवमानना की कार्यवाही प्रारंभ करते समय न्यायालय को संयम और सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। आमतौर पर पहले नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा जाना चाहिए। नीतिगत और जटिल मामलों में न्यायालय को आदेशों के अनुपालन के लिए युक्तियुक्त समय सीमा निर्धारित करने के निर्देश दिए गए हैं।

यदि सरकार को किसी आदेश के पालन के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता हो, तो वह समय सीमा में संशोधन के लिए न्यायालय से अनुरोध कर सकती है, जिस पर विचार किया जा सकता है।