जांजगीर कलेक्ट्रेट मार्ग को जाना जाएगा शहीद वीर नारायण सिंह के नाम से, स्थापित होगी आदमकद प्रतिमा

JJohar36garh News|जांजगीर जिला के कलेक्ट्रेट मार्ग को अब शहीद वीर नारायण सिंह के नाम से जाना जाएगा साथ ही चौक के किनारे शहीद वीर नारायण सिंह की आदमकद प्रतिमा भी स्थापित होगी | इस संबंध में नगर पालिका परिषद जांजगीर नैला की ओर से हरी झंडी भी मिल चुकी है | 6 सितंबर को हुई बैठक में इस पर सर्वसम्मति से प्रस्ताव भी पारित हो गया है |  10 दिसंबर को छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज द्वारा चौक के किनारे स्वयं के खर्च पर प्रतिमा स्थापित की जाएगी |

छत्तीसगढ़ सर्व आदिवासी समाज के जिलाध्यक्ष गोविंद कंवर ने बताया काफी लंबे समय से समाज द्वारा इसकी मांग की जा रही थी, सभी जगह पत्र प्रेषित किए जाने के बाद यह मांग पूरी हुई हैं | 10 दिसंबर को समाज द्वारा चौक के किनारे स्वयं के खर्च पर प्रतिमा स्थापित की जाएगी | उन्होंने शहीद वीर नारायण सिंह के सम्बन्ध में बताते हुए कहा कि सत्रहवीं सदी में सोनाखान राज्य की स्थापना की गई थी। इनके पूर्वज गोंडवाना साम्राज्य के सारंगढ़ के जमींदार के वशंज थे। बाद में उन्होंने अपने आप को राजगोंड से बिंझवार आदिवासी मे परिवर्तन कर लिए। सोनाखान का प्राचीन नाम सिंहगढ़ था। कुर्रूपाट डोंगरी में युवराज नारायण सिंह के वीरगाथा का जिन्दा इतिहास दफन है। युवराज नारायण सिंह के पास एक घोड़ा था जो कि स्वामीभक्त था। वे घोड़े पर सवार होकर अपने रियासत का भ्रमण किया करत थे। भ्रमण के दौरान एक बार युवराज को किसी व्यक्ति ने जानकारी दी कि सोनाखान क्षेत्र में एक नरभक्षी शेर कुछ दिनों से आतंक मचा रहा है जिसके चलते प्रजा भयभीत है। प्रजा की सेवा करने में तत्पर नारायण सिंह ने तत्काल तलवार हाथ में लिए नरभक्षी शेर की ओर दौड़ पड़े और कुछ ही पल में शेर को ढेर कर दिए। इस प्रकार से वीर नारायण सिंह ने शेर का काम तमाम कर भयभीत प्रजा को नि:शंक बनाया। उनकी इस बहादुरी से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें वीर की पदवी से सम्मानित किया। इस सम्मान के बाद से युवराज वीरनारायण सिंह बिंझवार के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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प्रजा हितैषी का एक अन्य उदाहरण सन् 1856 में पड़ा अकाल है जिसमें नारायण सिंह ने हजारों किसानों को साथ लेकर कसडोल के जमाखोरों के गोदामों पर धावा बोलकर सारे अनाज लूट लिए व दाने-दाने को तरस रहे अपने प्रजा में बांट दिए। इस घटना की शिकायत उस समय डिप्टी कमिश्नर इलियट से की गई। वीरनारायण सिंह ने शिकायत की भनक लगते हुए कुर्रूपाट डोंगरी को अपना आश्रय बना लिया। ज्ञातव्य है कि कुर्रूपाट गोड़, बिंझवार राजाओं के देवता हैं। अंतत: ब्रिटिश सरकार ने देवरी के जमींदार जो नारायण सिंह के बहनोई थे के सहयोग से छलपूर्वक देशद्रोही व लुटेरा का बेबुनियाद आरोप लगाकर उन्हें बंदी बना लिया। 10 दिसम्बर 1857 को रायपुर के चौराहे वर्तमान में जयस्तंभ चौक पर बांधकर वीरनारायण सिंह को फांसी दी गई। बाद में उनके शव को तोप से उड़ा दिया गया और इस तरह से भारत के एक सच्चे देशभक्त की जीवनलीला समाप्त हो गई। उल्लेखनीय है कि गोंडवाना साम्राज्य के शेर कहे जाने वाले अमर शहीद वीरनारायण सिंह बिंझवार को राज्य का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा प्राप्त है।

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