बाप-बेटे पुलिसवाले सबने नोंचा, वो चीखती रही, दो महीने तक नाबालिग किशोरी का करते रहे रेप, 23 बाद मिला न्याय, 7 दोषियों को मिली उम्रकैद की सजा

23 बाद मिला न्याय : बाप-बेटे, पुलिसवाले… सबने नोंचा, वो चीखती रही, लेकिन किसी को भी रहम नहीं आई. हैवान उसे बेहोश करते और फिर रेप करते. ये सिलसिला कोई एक दिन नहीं, बल्कि दो महीने तक चला. फिर हैवानों ने लड़की को सड़क पर फेंक दिया. पीड़िता और उसके परिजन जब न्याय की आस में थाने पहुंचे तो उन्हें वहां भी सताया गया. पुलिस ने पूरा केस ही पलट दिया और गांव के निर्दोषों को फंसा दिया. हालांकि, पीड़िता टूटी नहीं, उसने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. 23 साल तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी. अब एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम (अंजू राजपूत) ने 7 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के खैर में 2002 में गैंगरेप की इस घटना ने हिला कर रख दिया था.

23 बाद मिला न्याय : घटना 30 अक्टूबर 2002 की सुबह की है, जब खैर क्षेत्र के एक गांव की 13 वर्षीय अनुसूचित जाति की नाबालिग किशोरी खेत से लौट रही थी. तभी गांव के तीन लोगों रामेश्वर, प्रकाश और साहब सिंह ने उसका अपहरण कर लिया. उसे एक गाड़ी में डाल दिया गया, जिसे बसपा नेता राकेश मौर्या चला रहा था. वाहन में सेवानिवृत्त एसएचओ रामलाल वर्मा भी मौजूद था. पीड़िता को पहले एक गोदाम में बंद कर कई दिनों तक नशीला पदार्थ देकर बेहोश रखा गया, जहां उसके साथ लगातार दरिंदगी की गई.

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गैंगरेप के बाद हामिदपुर गांव के पास फेंका

23 बाद मिला न्याय : सामूहिक दुष्कर्म में सात लोग शामिल पाए गए, जिनमें रामेश्वर, प्रकाश, खेमचंद्र, जयप्रकाश, सेवानिवृत्त एसएचओ रामलाल वर्मा, उसका बेटा बॉबी और तत्कालीन खैर थाने के एसएचओ पुत्तूलाल प्रभाकर, जो बाद में इसी केस के पहले विवेचक भी बने. पीड़िता को बाद में अनुषिया गांव में जयप्रकाश के घर ले जाया गया, जहां अत्याचार जारी रहा. दो महीने बाद, दिसंबर 2002 में, आरोपियों ने किशोरी को टप्पल थाना क्षेत्र के हामिदपुर गांव के पास फेंक दिया, जहां ग्रामीणों ने उसकी मदद की.

एसएचओ ने निर्दोष ग्रामीणों को फंसाया

23 बाद मिला न्याय : इसके बाद पीड़िता के पिता ने खैर थाने में अपहरण और दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज कराया, लेकिन तत्कालीन एसएचओ प्रभाकर ने प्रारंभिक जांच में आरोपियों के नाम हटा दिए और निर्दोष ग्रामीणों बोना और पप्पू उर्फ विजेंद्र को झूठा आरोपी बना दिया. न्याय के लिए संघर्ष करते हुए पीड़िता के परिवार ने हाईकोर्ट की शरण ली. 17 फरवरी 2003 को हाईकोर्ट के आदेश पर पीड़िता का बयान दर्ज किया गया.

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तीन चरणों में जांच पूरी

23 बाद मिला न्याय : इस खुलासे के बाद मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील बन गया, क्योंकि बसपा नेता राकेश मौर्या का नाम सामने आया था. 2002 से 2007 के बीच बसपा शासनकाल में कोई कार्रवाई नहीं हुई, बल्कि मुकदमा वापस लेने की कोशिशें की गईं. सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई, जिसने तीन चरणों में जांच पूरी कर सात आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की.

अब 15 अक्टूबर 2025 को एडीजे फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम (अंजू राजपूत)ने सामूहिक दुष्कर्म के तहत दोषी करार देते हुए 20 वर्ष का कठोर कारावास और 50-60 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है.अदालत ने आदेश दिया कि जुर्माने की 75% राशि पीड़िता को दी जाए.

 

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