“एक रोटी कम खाओ, लेकिन बच्चों को पढ़ाओ”
महान समाज सुधारक संत गाडगे महाराज का एक प्रसिद्ध संदेश है, जो शिक्षा के महत्व पर जोर देता है। इसका अर्थ है कि अपनी भौतिक जरूरतों या भोजन में कटौती करके भी अपने बेटा-बेटी को अच्छी शिक्षा दिलाना, ताकि वे शिक्षित होकर सक्षम बन सकें और आत्मनिर्भर बन सकें
आधुनिक भारत को जिन महापुरूषों पर गर्व होना चाहिए, उनमें राष्ट्रीय सन्त गाडगे बाबा का नाम सर्वोपरि है । मानवता के सच्चे हितैषी, सामाजिक समरसता के द्योतक यदि किसी को माना जाए तो वे थे संत गाडगे । वास्तव में गाडगे बाबा के जीवन, उनके कार्यों तथा उनके विचारों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं । हम समाज और राष्ट्र को काफी कुछ दे सकते हैं । गाडगे बाबा ने अपने जीवन, विचार एवं कार्यों के माध्यम से समाज और राष्ट्र के सम्मुख एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया, जिसकी आधुनिक भारत को वास्तव में महति आवश्यकता है ।
गाडगे बाबा के लाखों अनुयायी थे, जिनमें मजदूर से लेकर मंत्री तक थे । लेकिन विश्व के महापुरुषों में से एक बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर भी उनके प्रशंसक थे । यदाकदा उनसे भेंट भी किया करते थे और वे अपने गुरू ज्योतिबा फुले के बाद गाडसे बाबा को सबसे बड़ा त्यागी जनसेवक मानते थे । बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर संत गाडगे बाबा के प्रयासों से बहुत प्रभावित थे कभी-कभी वे संत गाडगे बाबा का प्रवचन सुनने जाते थे । बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर के पहुचने पर बाबा गाडगे बाबा सहब के जय के नारे लगवाते थे । 1942-43 में मनमाड आंदोलन के दौरान संत गाडगे बाबा ने डॉ. भीम राव अम्बेडकर को शोषितो-पीड़ितों का उद्धारक कहा था । 14 जुलाई 1949 को संत गाडगे की बीमारी पर विधिमंत्री के रूप में बाबासाहेब उन्हें अस्पताल में देखने गये । बाबा साहब ने शाल ओढ़ाकर संत गाडगे को सम्मानित किया । गाडगे बाबा के अन्य कई समकालीन नेताओं से अच्छे संबंध थे लेकिन बाबा साहब डॉ. भीम राव अम्बेडकर जैसे सम्बन्ध किसी के साथ नहीं थे । दोनों में अनुयायियों जैसा नही बल्कि एक दूसरे में प्रशंसकों का रिश्ता था । यही कारण है कि संत गाडगे बाबा ने अछूतों के लिए बनाई गई पंढरपुर की चोखामेला धर्मशाला महात्मा गांधी के स्थान पर डॉ. भीम राव अम्बेडकर के हवाले की । वह अपने अनुयायियों को बुलाकर समझाते कि जितने त्याग, ईमानदारी पवित्रता की भावना से यह सेवा कार्य आज तक होता आया है आगे भी होता रहेगा तो मानवता का भला होगा । इस कार्य को जारी रखने की कोशिश मे लगे रहना ।

बाबा अपने अनुयायिययों से सदैव यही कहते थे कि मेरी जहां मृत्यु हो जाय वहीं पर मेरा अंतिम संस्कार कर देना, मेरी मूर्ति, मेरी समाधि, मेरा स्मारक मंदिर नहीं बनाना, मैनें जो कार्य किया है वही मेरा सच्चा स्मारक है । 6 दिसम्बर 1956 को डॉ. भीम राव अम्बेडकर के निधन से संत गाडगे बाबा अंदर से टूट गये और उनका स्वास्थ्य गिरता गया । क्योंकि वे डॉ. भीम राव अम्बेडकर को दलितों का मसीहा मानते थे । जब बाबा की तबियत ज्यादा खराब हुर्इ तो चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी किन्तु वहां पहुँचने से पहले बलगांव के पास पिढ़ी नदी के पुल पर डॉ. भीम राव अम्बेडकर के निधन के ठीक 15वें दिन 20 दिसम्बर 1956 को रात्रि 12 बजकर 20 मिनट पर बाबा की जीवन ज्योति समाप्त हो गयी, जहां उनकी इच्छानुसार बाबा का अंतिम संस्कार किया गया । आज वह स्थान गाडगे नगर के नाम से जाना जाता है ।

इस देश की धरती पर समाज सेवक, संत, महात्मा, जन सेवक, साहित्यकार एवं मनीषी जन्म लेगें परन्तु मानव मात्र को अपना परिजन समझकर उनके दु:ख दर्द को दूर करने में अनवरत रूप से तत्पर गाडगे बाबा जैसा नि:स्पृह एवं समाजवादी सन्त बड़ी मुश्किल से मिलेगा । क्योंकि रूखी-सूखी रोटी खाकर दिन-रात जनता के कष्टों को दूर करने वाला गाडगे सदृश जनसेवी सन्त र्इश्वर की असीम कृपा से ही पृथ्वी पर अवतरित होते हैं । मानवता के पुजारी दीनहीनों के सहायक संत गाडगे बाबा में उन सभी सन्तोचित महान गुणों एवं विशेषताओं का समावेश था जो एक महान संत में होने चाहिए ।
महाराष्ट्र सहित समग्र भारत में सामाजिक समरता, राष्ट्रीय एकता, जन जागरण एवं सामाजिक क्राँति के अविरत स्रोत के वाहक संत गाडगे बाबा का जन्म त्रयोदशी कृष्ण पक्ष महाशिवरात्री पर बुधवार, 23 फरवरी, 1876 को महाराष्ट्र के अकोला जिले के खासपुर गाँव में धोबी परिवार में हुआ था । बाद में खासपुर गाँव का नाम बदल कर शेणगाव कर दिया गया । उनका पूरा नाम देवीदास झिंगरजी जाणोरकर था । गाडगे बाबा का बचपन का नाम डेबू था उनके पिता का नाम झिंगरजी माता का नाम साखूबाई और कुल का नाम जाणोरकर था । डेबुजी अपनी माँ-बाप की अकेली संतान थे । डेबु जब काफी छोटे थे, तभी उनके पिताजी का देहांत हो गया था । झिंगरजी के गुजर जाने के बाद सखुबाई इस छोटे से बच्चे को लेकर अपने भाई के आश्रम में आकर रहने लगीं । गाडगे महाराज ने अपनी आयु के आठवें वर्ष से अपने घर की विपन्न/संकटग्रस्त परिस्थिति की, अपने समाज के पिछड़ेपन का, समाज के अनपढ़ होने का निरीक्षण किया । महाराज जी ने स्वयं के अपरिमित परिश्रम से अपने मामा की खेती को लहलहाकर अज्ञान, दरिद्रता, अंधश्रद्धा वाले अपने समाज के समक्ष अपने परिश्रम का आदर्श रखा ।
उस काल में शिक्षा से वंचित रखे गये हिन्दू समाज को सभी दलित जातियों में अज्ञानता, अंधविश्वास, गरीबी, शराबखोरी आदि विद्यमान थे । गंदे वातावरण के रहने एवं अच्छे भोजन के अभाव में बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते थे । गरीबी को झेलते दलितों को बेगार के नाम पर कमरतोड़ मेहनत के साथ जलालत भी मुफ्त में झेलनी पड़ती थी । इन अथाह दुःखों को शोषित समाज सदियों से पिछले जन्मों के कर्मों का फल और भाग्य का लेखा-जोखा समझ कर झेल रहा था । इसलिए विद्रोह के लिए उनके अंदर शक्ति ही नहीं बची थी । शोषित समाज विवेकशून्य होकर पशुतूल्य जीवन जी रहा था । उन दिनों क्षेत्र में निर्गुण परंपरा के संत नाम देव, चोखामेला आदि का बड़ा प्रभाव था । भगत मंडलियों द्वारा उनकी वाणी गाई जाती, और मंडली के लोग संतों के उपदेशों की व्याख्या भी करते थे । इसका बालक डेबू पर प्रभाव शुरू होने लगा था ।
डेबू बचपन से ही सफाई पसंद और कुछ अलग प्रवृति के थे । वे साथ के बच्चों से हट कर रहते थे । वे निर्विकार भाव से घंटों आसमान की ओर कुछ देखा करते थे । माँ को बच्चे की यह प्रवृति परेशान करती थी । लेकिन बड़े होने के साथ उनमें अन्य साथी बच्चों के साथ घुलने-मिलने की आदत बढ़ने के साथ खेती बाड़ी और पशुओं को चराने में रूचि बढ़ी । युवा होने पर दापुरे गांव के एक गरीब धोबी थनाजी खल्लारकर की बेटी कुंताबाई के साथ उनकी शादी धूमधाम के साथ हुई । डेबुजी भजन-कीर्तन किया करते थे जिसके कारण वे मंडली के साथ धार्मिक सामाजिक समारोहों में जाते तो उन्हें चारों तरफ दलित समुदाय के बीच समस्याएं ही समस्याएं नजर आती । बेगार की समस्या छुआछूत, कर्ज, भुखमरी, कुपोषण-महामारियों के बीच चारों तरफ गन्दगी उपर से नशाखोरी और अन्धविश्वासों की परंपरा । युवा डेबू सोचने को मजबूर हुए क्योंकि इस ओर किसी भी साधू संत या महापुरुष का ध्यान नहीं गया । अब उन्हें लगने लगा कि अपने समाज के लिए कुछ करना होगा, यह दर्द हमारा है तो इनका इलाज भी हमें ही करना होगा । उन्होंने दलित समाज को सबकुछ समर्पित करने की ठान ली । उनका सोचना था कि पेट के लिए तो पशु-पक्षी भी मेहनत करते हैं, अगर मैं भी यह सब करता रहा तो मुझे और पशु-पक्षी में मौलिक अंतर क्या रहेगा ? क्या मैं खुद इस त्याग के काबिल हूँ । साथ ही उन्हें माँ और गर्भवती पत्नी कुंताबाई व दो बेटियों अलोकाबाई, कलावती बाई के चेहरे कौंधने लगते परिवार के सभी सदस्य मेहनत-मजदूरी करने पर ही पेट भर रोटी, बदन भर कपड़ा पा पाते है । तो वह मेरे बाद भी इतना पा सकते है । पत्नी के साथ सूखपूर्वक पारिवारिक जीवन व्यतीत होने के बाद भी उनके अन्तर्मन में द्वंद चलता रहता क्योंकि दलित बस्तियों की स्थिति अत्यंत ही दयनीय थी, दूसरों को साफ-सूथरा रखने वाले स्वयं ही गंदी बस्तियों में रहने के लिए मजबूर थे, जिससे वे अनेको बिमारियों से ग्रस्त रहते थे । जिसका मुख्य कारण इनमें शिक्षा का अभाव एवं अंधविश्वास था । यह भी एक संयोग है कि 29 वर्ष की आयु में तथागत बुद्ध ने भी 29 वर्ष में गृह त्याग किया था । गौतम बुद्ध की भाति पीड़ित मानवता की सहायता तथा समाज सेवा के लिये उन्होनें सन 1905 को गृहत्याग किया एक लकड़ी तथा मिटटी का बर्तन जिसे महाराष्ट्र में गाडगा (लोटा) कहा जाता है लेकर आधी रात को घर से निकल गये । दया, करूणा, भ्रातृभाव, सममैत्री, मानव कल्याण, परोपकार, दीनहीनों के सहायतार्थ आदि गुणों के भण्डार बुद्ध के आधुनिक अवतार डेबूजी सन 1905 में गृहत्याग से लेकर सन 1917 तक साधक अवस्था में रहे । सदैव गाडगा (लोटा) लेकर चलने के कारण लोग इन्हें गाडगे बाबा कहकर पुकारने लगे, जिसके कारण देवीदास झिंगरजी जाणोरकर अब संत गाडगे बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गये ।
1905 से 1917 के साधना के दौरान 1907 में अमरावती के पास ऋषमोचन नामक गांव में एक बहुत बड़ा मेला लगा हुआ था । मेले में हजारों लोग आए हुए थे लेकिन वहां सफाई का नामोनिशान न था । लोग भोजन की जूठी पत्तलों, दोनों और मिट्टी के बर्तनों को जहां-तहां फेंके जा रहे थे । जिससे और अधिक गंदगी बढ़ती ही जा रही थी लेकिन किसी का इस ओर ध्यान नहीं था । मेले में युवा संत गाडगे महाराज भी उपस्थित थे । वह चारों ओर गंदगी देखकर अकेले ही झाड़ू लेकर सार्वजनिक मेला स्थल पर सफाई करने में जुट गए । यह देखकर दर्शनार्थियों के मन में कौतूहल के साथ-साथ उनके प्रति आदर भाव जागृत हुआ और वहां भीड़ लग गई ।
भीड़ को एकत्रित देखकर गाडगे महाराज बोले, “आप मुझे इस तरह हैरत से क्यों देख रहे हैं? मैं कोई अजूबा नहीं हूं, न ही मैं कोई अनोखा काम कर रहा हूँ । फर्क इतना है कि जिस सफाई को आप केवल अपने घरों तक सीमित रखना चाहते हैं, उसी सफाई को मैं पूरे देश में फैलाना चाहता हूँ । गंदगी के कारण ही महामारी और असंख्य बिमारियां पनपती हैं । इसमें हम सभी का हाथ होता है और बीमारी की चपेट में आने वाले भी हम ही होते हैं । लेकिन हम जागते तभी हैं जब इसकी चपेट में आते हैं । मुझमें और आप में इतना अंतर जरूर है कि मैं पहले ही जागरूक हो गया हूं और यहां सफाई कर रहा हूँ ।” गाडगे महाराज की बातें सुनकर वहां मौजूद दर्शनार्थियों की नजरें झुक गईं । इसके बाद सभी श्रद्धालु झाड़ू लिए सफाई में जुट गए । बाबा गाडगे एक गाँव से दूसरे गाँव घूम-घूम कर स्वच्छता अभियान चलाते और संध्या समय भजन कीर्तन के द्वारा लोगों को शिक्षा के महत्व को बताते एवं अंधविश्वास को दूर करने का प्रयास करते ।

क्षेत्रीय दलित समाज में डेबूजी का नाम नया नहीं था । लोग उन्हें भजन गायक और उपदेशक के रूप में पहले ही जानते थे । परंतु इस समय कुछ नया उनका लिबास ही था । एक दिन वह चलते-चलते एक दलित बस्ती में चले गये, लोगों ने उनको पहली नजर में भिखारी समझा, लेकिन नजदीक आने पर उन्हें पहचान लिया, पूरी बस्ती में कुड़े के ढेर थे, जिसके कारण बदबू आ रही थी, मक्खियां भिनभिना रही थी, इधर-उधर सुअर लोट रहे थे । डेबू बाबा बस्ती के दलितों को संबोधित करते हुए कहा भाइयों और बहनों आप अपने घरों के बगल में इस गंदगी को देखो यह गंदगी कई किस्म की बीमारियों का कारण बनती है भाई लोग ताश खेलते है, शराब पीने में लगे रहते है, बहनें इधर उधर बातों में अपना समय नष्ट करती हैं, जबकि हमें अपने खाली समय में आश-पास स्वच्छता अभियान चलना चाहिए । यदि हमें आस-पास स्वच्छता चाहिए तो अनिवार्य रूप से स्वच्छता अभियान से जुड़ना और चलाना होगा । इसके साथ वह स्वयं जुट गये तो लोग भी उनका साथ देने लगे, शाम तक बस्ती चमक गई । इस प्रकार वह एक गांव की सफाई करते हुए दूसरे गांव की ओर चलते गये और वे गांव-गांव बस्ती-बस्ती चर्चित होने लगे । कुछ लोग इसके एवज में गाडगे बाबा को पैसा भी देने लगे । गाडगे बाबा इसमें से थोड़े पैसे अपने पास रख लेते और अधिकांश गावं के मुखिया को यह कर लौटा देते कि ये गाँव की सफाई पर खर्च करें ।
लोगों से मिले हुए पैसों से महाराज गाँवो में स्कूल, धर्मशाला, अस्पताल और जानवरों के निवास स्थान बनवाते थे । गाँवो की सफाई करने के बाद शाम में वे कीर्तन का आयोजन भी करते थे और अपने कीर्तनों के माध्यम से जन-जन तक लोकोपकार और समाज कल्याण का प्रसार करते थे । अपने कीर्तनों के समय वे लोगो को अन्धविश्वास की भावनाओं के विरुद्ध शिक्षित करते थे । अपने कीर्तनों में वे संत कबीर के दोहों का भी उपयोग करते थे । वे लोगों को जानवरों पर अत्याचार करने से रोकते थे और वे समाज में चल रही जातिभेद और रंगभेद की भावना को नहीं मानते थे और लोगों के इसके खिलाफ वे जागरूक करते थे तथा समाज में शराबबंदी के लिए लोगों को प्रेरित करते थे । वे लोगो को कठिन परिश्रम, साधारण जीवन और परोपकार की भावना का पाठ पढ़ाते थे और हमेशा जरूरतमंदों की सहायता करने को कहते थे ।
उस समय अधिकांश यात्रा पैदल घोड़ा या बैलगाड़ी से तय होती, जिसमें यात्रियों को रात पेड़ों के नीचे ही बितानी पड़ती थी । यात्रियों की सुविधा के लिए कुएं, तालाबों का निमार्ण कराया । यह सब मानव सहयोग से उन्हीं के प्रयोग के लिए उपलब्ध हुआ न किसी ईश्वरी शक्ति के माध्यम से । बाबा श्रम करते समय दलितों तथा मजदूरों को समझाते रहते कि संसार में जो तुम निर्माण एवं विकास देखते हो यह आपके ही श्रम का फल है । बाबा का अगला कदम मरीजों के लिए अस्पतालों तथा कुष्ठरोगियों के लिए कुष्ठ आश्रमों का निर्माण कराया । जहां तथाकथित धार्मिक स्थलों पर बकरे, मुर्गे, भैसे कटते थे, वहाँ बाबा ने इससे हटकर जीवदया नामक संस्थाओं की स्थापना की शुरूआत की ।
गाडगे बाबा शिक्षा को मनुष्य की अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित करते थे । अपने कीर्तन के माध्यम से शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये वे कहते थे “शिक्षा बड़ी चीज है, तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिए कम दाम के कपड़े खरीदो, टूटे फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिए बिना ना रहो ।”
गाडगे बाबा मन्दिरों और मूर्ति पूजा के विरोधी थे । गाडगे बाबा कहते, पत्थर की मूर्तियों के लिए इतने आलीशान महल और देहधारी दलितों के लिए झोपड़ियां, कुछ के पास वह भी नहीं था । मन्दिरों में निठल्ले लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए तरह-तरह के अंधविश्वास फैलाते रहे । शूद्र-अतिशूद्र समाज की गर्दन काटने का षडयंत्र इन्हीं ठिकानों में बुने जाते रहे है । वह मंदिर मूर्ति के बजाय जन कल्याण समाज व विकास के लिए शिक्षा के विद्या मंदिरों में विश्वास करते थे । अतः बाबा शिक्षा के विकास की ओर बढ़ने लगे और इसके लिए कई संस्थाएं स्थापित की गई । उन्होंने दूषित दिमागों को धोने का आंदोलन कम समय में सफलतापूर्वक किया जो आज भी एक शक्तिवान के रुप में स्थापित है । गाडगे बाबा साधुओं, संतों, महंतो किस्म-किस्म के बाबाओं के पीछे किस्म के बाबाओं के पीछे हाथ धोकर पड़े रहे, उन्होंने उनके धार्मिक पाखण्डों की धज्जियां उड़ा दी । वह इन गद्दियों को दुकानदारी और चमत्कारों का पेट पालने का बड़ा साधन मानते थे । उन्हें ईश्वर, आत्मा पुनर्जन्म ब्रह्मधाम आदि बेकार की बातों पर उनका विश्वास नहीं था ।
आंखे मूंदकर राम नाम जपने को वे ढोंग मानते और ऐसे उपदेशकों को ढोंगी । वे खुद के बारे में कहते थे “मेरा कोई शिष्य नहीं है और मैं किसी का गुरू भी नहीं हूँ, स्वयं प्रेरणा से प्रपंच का मोह त्यागकर जो कोई अपनी इच्छा से दीन-दुःखियों और अनपढ़ गरीब लोगों को देवधर्म के बारे में सही ज्ञान देकर जागृत करने के काम में लगा है, वे सभी मेरे अनंत जन्म के गुरू है ।” वे कीर्तन के माध्यम से लोगों तक अपना संदेश पहुंचाते कि उनके दुःख का कारण गावों में फैला अन्धविश्वास है । जादू-टोना, देवी-देवता की अंध-पूजा में जकड़ गए हैं । पत्थरों के मूर्तियों की पूजा करने से उनका कल्याण नहीं हो सकता है । उन्हें अपना कल्याण तो स्वयं करना पड़ेगा । अगर वे किसी मुसीबत में हैं तो उपाय उन्हें स्वयं ढूँढना होगा । वे अपने कथन के समर्थन में कबीर और तुकाराम, ज्ञानदेव आदि संतों को उद्धृत करते थे ।
गाडगे बाबा की अनुयायियों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी, लोग उनके इशारे पर जनसेवा में जुटने लगे थे । गाडगे बाबा के पास कोई संगठन नहीं था । इसके वजह से कुछ अनियमिताएं तथा अनुशासन भंग की शिकायते आने लगी । अंततः बाबा के प्रमुख अनुयायियों ने संस्थाओं में अनुशासन बनाये रखने एवं बाबा के मिशन को तीव्रगति से चहुओर फैलाने के उद्देश्य से 8 फरवरी 1952 को गाडगे मिशन की स्थापना की । बाबा भी ऐसे समर्पित मानव थे कि उन्होंने सर्वाधिकार भी गाडगे मिशन को ही सौंप दिये । बाबा ने अपने जीवनकाल में लगभग 60 संस्थाओं की स्थापना की और उनके बाद उनके अनुयायियों ने लगभग 42 संस्थाओं का निर्माण कराया । उन्होनें कभी भी मंदिर निर्माण नहीं कराया अपितु दीनहीन, उपेक्षित एवं साधनहीन मानवता के लिये स्कूल, धर्मशाला, गौशाला, छात्रावास, अस्पताल, परिश्रमालय, वृध्दाश्रम आदि का निर्माण कराया । उन्होनें अपने हाथ में कभी किसी से दान का पैसा नहीं लिया । दानदाता से कहते थे दान देना है तो अमुक स्थान पर संस्था में दे आओ । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री बी.जी. खैर ने बाबा की सभी संस्थाओं का ट्रस्ट बना दिया जिसमें करीब 60 संस्थाएं है । आज भी यह मिशन जनसेवा को समर्पित है, इनकी अनकों योजनाएं अब सहकारी सहयोग से चल रही है । उन्हें सम्मान देते हुए महाराष्ट्र सरकार ने 2000-01 में “संत गाडगेबाबा ग्राम स्वच्छता अभियान” की शुरुवात की, और जो ग्रामवासी अपने गाँवो को स्वच्छ रखते है उन्हें यह पुरस्कार दिया जाता है ।

संत गाडगे जी का 150 वा जन्मदिन पर झलमला और पोड़ी मे धूमधाम ने कार्यक्रम का आयोजन किया गया | जिसमें राष्ट्रीय रजक महासंघ जिला बिलासपुर के संभागीय उपाध्यक्ष अमरनाथ निर्मलकर, पितरेश उजागर अध्यक्ष राष्ट्रीय रजक महासंघ जिला जांजगीर चांपा श्रवण कुमार निर्मलकर सचिव राष्ट्रीय रजक महासंघ जिला जांजगीर एवं नरेंद्र कुमार लहरे प्रदेश अध्यक्ष लगन जन कल्याण संगठन सभी शामिल थे |
