आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार क्या जनरल सीट पर नौकरी पा सकते हैं?, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया नियम

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी किसी पात्रता परीक्षा में दी गई छूट (रिलैक्सेशन) का लाभ लेते हैं, तब भी वे अंतिम चयन में उच्च मेरिट प्राप्त करने पर सामान्य (जनरल) श्रेणी की सीटों के लिए पात्र हो सकते हैं। बशर्ते संबंधित भर्ती नियम इसकी अनुमति देते हों।

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि छूट का लाभ लेने वाले उम्मीदवार सामान्य श्रेणी में ‘माइग्रेट’ नहीं हो सकते। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से महाराष्ट्र के टीईटी (TET) उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिली है।

क्या है पूरा मामला?

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह विवाद महाराष्ट्र में शिक्षा के अधिकार (RTE) के तहत होने वाली शिक्षक भर्ती से जुड़ा है। इसमें उम्मीदवारों को पहले शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) पास करनी थी और उसके बाद शिक्षक अभिक्षमता एवं बुद्धिमापन परीक्षण (TAIT) देना था, जिसके आधार पर अंतिम मेरिट (योग्यता) तय होनी थी। टीईटी पास करने के लिए सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों को 60% अंक चाहिए थे, जबकि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को 5% की छूट देते हुए 55% पर पास माना गया था।

विवाद तब शुरू हुआ जब आरक्षित वर्ग के कई उम्मीदवारों (जिन्होंने 5% छूट का लाभ लिया था) ने मुख्य परीक्षा (TAIT) में शानदार प्रदर्शन किया और सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से भी अधिक अंक प्राप्त किए। अधिक मेधावी होने के बावजूद उन्हें ओपन/जनरल कैटेगरी की मेरिट लिस्ट में शामिल करने से मना कर दिया गया। हाईकोर्ट ने भी इन उम्मीदवारों की याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।

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सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार द्वारा 13 फरवरी 2013 के सरकारी संकल्प के माध्यम से बनाए गए भर्ती नियमों में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि क्वालीफाइंग परीक्षा में छूट का लाभ लेने वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार ओपन कैटेगरी में नहीं जा सकते। कोर्ट ने कहा- अपीलकर्ता स्पष्ट रूप से सामान्य श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक योग्य हैं। भर्ती नियमों/अधिसूचना में किसी भी स्पष्ट रोक के अभाव में, उन्हें सामान्य श्रेणी के तहत विचार करने से बाहर नहीं किया जा सकता है। योग्यता मानदंडों में दी गई छूट केवल ‘पात्रता’ को प्रभावित करती है ‘मेरिट’ को नहीं। इसलिए रोक के अभाव में माइग्रेशन की अनुमति है।

जस्टिस अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में स्पष्ट किया गया कि कोई आरक्षित उम्मीदवार जनरल कैटेगरी की सीट पर जा सकता है या नहीं, यह पूरी तरह से संबंधित भर्ती नियमों या रोजगार अधिसूचना पर निर्भर करता है। कोर्ट ने हालिया मामलों जैसे ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सजीब रॉय (2025)’ और ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जी. किरण (2026)’ का उदाहरण दिया, जहां माइग्रेशन से इसलिए इनकार किया गया था क्योंकि भर्ती नियमों में इसकी स्पष्ट मनाही थी। वहीं ‘प्रदीप कुमार बनाम दिल्ली सरकार (2019)’ का मामला भी इस केस से अलग है, क्योंकि उस मामले में उम्मीदवारों ने आवश्यक ‘पात्रता मानदंड’ ही पूरे नहीं किए थे।

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सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए 5 कानूनी सिद्धांत:

  1. अर्हक (क्वालीफाइंग) परीक्षा में दी गई रियायत/छूट केवल एक उम्मीदवार को विचार के दायरे में प्रवेश करने के योग्य बनाती है। अगर अंतिम मेरिट सिर्फ मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू के प्रदर्शन पर तय होनी है, तो इस छूट का मेरिट पर कोई असर नहीं माना जाएगा।
  2. क्वालीफाइंग परीक्षा में छूट सिर्फ सभी को बराबरी का मौका प्रदान करती है, जहां अंतिम चयन में कोई रियायत नहीं दी जाती है और चयन पूरी तरह से आपसी योग्यता के आधार पर होता है।
  3. यदि आरक्षित वर्ग का कोई उम्मीदवार चयन के लिए निर्धारित ‘आवश्यक पात्रता मानदंडों’ को पूरा नहीं करता है, तो उसे ओपन कैटेगरी में जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
  4. अर्हक परीक्षा में छूट लेने वाले आरक्षित उम्मीदवार का सामान्य श्रेणी में जाना भर्ती नियमों या अधिसूचना पर निर्भर करता है। यदि नियम इसकी अनुमति देते हैं, तो यह पूरी तरह मान्य है।
  5. सबसे महत्वपूर्ण: यदि भर्ती नियम या रोजगार अधिसूचना इस मुद्दे पर मौन हैं या स्पष्ट रूप से इस पर रोक नहीं लगाते हैं, तो भी यह माइग्रेशन (सामान्य सीट पर दावा) मान्य होगा।
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अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीदवारों की अपील स्वीकार करते हुए संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे उन अपीलकर्ताओं को सामान्य श्रेणी की मेरिट सूची में शामिल करें, जिन्होंने सामान्य श्रेणी में अंतिम चयनित उम्मीदवार से 30 अंक अधिक प्राप्त किए हैं।