बलौदा बाजार हिंसा और लोहरीडीह घटना में पुलिस की कार्य पद्धति पर सामाजिक कार्यकर्ता संजीत वर्मा ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने फेसबुक में कुछ सवाल किए हैं| जिसमे उन्होंने कहा है की –
ध्यान देने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ में बलौदाबाजार और लोहारीडीह में दो पृथक घटनाएं घटित हुई।
लेकिन सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली दोनों ही घटनाओं में पृथक-पृथक रही।
लोहारीडीह में जहां घटना दिनांक से ढाई माह बाद राहत प्रदान करते हुए नजर आ रही है वहीं बलौदाबाजार मामले में घटना दिनांक से साढ़े पांच माह बाद भी दमन करते हुए नजर आ रही है।
लोहारीडीह में जहां 69 गिरफ्तारी के बाद अन्य आरोपियों की गिरफ्तारियां थम सी गई है वहीं बलौदाबाजार मामले में 187 गिरफ्तारी के बाद भी अन्य आरोपियों की खोजबीन जारी है।
लोहारीडीह में जहां एसआईटी गठित कर जेल में बंद 69 में से 24 लोगों को निर्दोष बताकर जेल से रिहाई के लिए द्वार खोले जाने की तैयारी पूरी हो चुकी है वहीं बलौदाबाजार मामले में राजनीतिक खानापूर्ति के अलावा आज तक कुछ भी नहीं किया गया है।
लोहारीडीह गांव में दो पक्षों में चुनावी रंजिश को लेकर विवाद हुई। हत्या और हत्या के बदले हत्या करने के लिए भीषण संघर्ष हुआ। पीट पीट कर हत्या की गई घर को आग के हवाले कर दिया गया, पुलिस टीम पर भी हमला हुई फिर 69 गिरफ़्तारियां हुई।
वहीं बलौदाबाजार मामले में जैतखाम को क्षतिग्रस्त करने पर संदिग्ध गिरफ्तारी को लेकर प्रदेश स्तरीय आंदोलन हुई जिस पर पुलिस ने पानी की बौछार करी, आंसू गैस के गोले छोड़े लाठीचार्ज हुई तब जाकर भीड़ उग्र हुई।
भीड़ ने तोड़फोड़ किए आगजनी किए जिसके फोटो विडियो पुलिस के पास मौजूद है लेकिन जिनकी संलिप्तता नहीं है जिनके खिलाफ फोटो विडियो के साक्ष्य नहीं है सिर्फ आंदोलन में उपस्थिति के आधार पर उन्हें भी गिरफ्तार कर दमनात्मक तरीके से कार्रवाई को अंजाम दिया जा रहा है।
दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र पर जातितंत्र भारी पड़ता है। इस समस्या का समाधान होते हुए फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है ना ही किसी राजनीतिक दल की महत्वाकांक्षा रही है।
एक भारत देश है जहां सब अपने जाति की गिरोह के साथ जीवन जी रहे हैं कहीं कोई भारी पड़ता है तो कहीं कोई और पर भारी पड़ जाता है।
अनुसूचित जाति वर्ग के लोग भारत का संविधान के कारण लोकतांत्रिक तौर पर अपने जनबल की ताकत से शासन प्रशासन का ध्यानाकर्षण से अपनी मांग रखते हैं लेकिन शासन प्रशासन पर बैठे हुए लोगों की मानसिकता अब भी मनुवादी व्यवस्था पर केंद्रित है।
जिनके कारण से देश की आबादी का पांचवां हिस्सा मतलब 20% आबादी वाले लोग संविधान लागू होने के 75 साल बाद आजादी के अमृतकाल में भी सड़क पर न्याय मांगने के लिए उतरने पर मजबूर होते रहते हैं।
Vishnu Deo Sai जी आप मुख्यमंत्री पद का शपथ लिए हैं कि मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूंगा ।
फिर बलौदाबाजार में सतनामी समाज के साथ द्वेष की भाव और लोहारीडीह में साहू समाज के साथ अनुराग की भाव क्यों ?
एक घटना पर एसआईटी और दूसरे घटना पर चुप्पी क्यों ?
आप भाजपा के मुख्यमंत्री नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हो।
👉 हरिभूमि अखबार में बेकसूरों की संख्या 32 बताई गई है और दैनिक भास्कर में बेकसूरों की संख्या 24 बताई गई है। साथ ही अन्य वेब पोर्टल पर भी 24 बताई गई है। इस आधार पर मैं भी 24 संख्या को मानकर लिख रहा हूं।