11 प्रतिशत का डिस्काउंट, रूस से तेल खरीदकर भारत ने 3 साल में बचाए 25 अरब डॉलर

नई दिल्ली

अमेरिका और NATO जो कुछ दिनों पहले तक भारत की ओर से रूस से कच्चे तल के आयात पर चिंता जता रहे थे अब सीधे धमकी भरी भाषा में बात कर रहे हैं. नाटो ने बुधवार को कहा कि अगर भारत, चीन और ब्राजील रूस से कच्चा तेल मंगाना जारी रखते हैं तो अमेरिका इन देशों पर 100 फीसदी का सेकेंडरी सैंक्शंस लगा सकता है. 

अमेरिका ने भारत को चेतावनी दी कि रूसी तेल आयात को लेकर पश्चिमी देशों की नीतियों का पालन करना होगा, वरना व्यापारिक और कूटनीतिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. दरअसल रूस से कच्चे तेल के आयात को अमेरिका और नाटो यूक्रेन युद्ध से जोड़कर देखते हैं. अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन द्वारा रूस से कच्चा तेल मंगाने की वजह से रूस के वॉर मशीन को फंडिंग होती है.

अमेरिका को लगता है कि अगर भारत और चीन रूस से कच्चा तेल न मंगाए तो मॉस्को यूक्रेन से युद्ध का खर्चा न उठा पाएगा और उसे जंग बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.

लेकिन अमेरिका की ये चाहत भारत और चीन के लिए अरबों डॉलर के नुकसान का सौदा है.

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तीन साल में भारत को 11 से 25 अरब डॉलर की बचत

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85% से अधिक हिस्सा आयात करता है. घरेलू उत्पादन बढ़ाने के बावजूद भारत को अपनी अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए भारी मात्रा में तेल का विदेशों से आयात करना पड़ता है. भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 35% रूस से आयात करता है, जो सस्ता होने के कारण 2022-2025 के बीच भारत को 10.5 से 25 अरब डॉलर की बचत करा चुका है. 

वर्ष 2025 की शुरुआत में भारत ने अपनी कुल आयातित कच्चे तेल का लगभग 40% हिस्सा रूस से मंगाया. मई-जून 2025 में यह मात्रा लगभग 38–44% के बीच रहा.

बता दें कि 2022 से पहले भारत को तेल बेचने वाले बड़े देशों में ईराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल थे. लेकिन 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर आक्रमण किया तो वह अपने युद्ध के खर्चे को पूरा करने के लिए भारत, चीन और तुर्की जैसे देशों को सस्ता कच्चा तेल बेचने लगा.

रूस से सस्ते कच्चे तेल की खरीद से भारत को 2022-2024 की अवधि में करीब 11 से 25 अरब अमेरिकी डॉलर की अनुमानित बचत हुई है.

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 11 से 16% तक सस्ता पड़ा है कच्चा रूसी तेल 

वित्त वर्ष 2023-24 में ही छूट पर रूसी तेल मंगाने से भारत को लगभग 7.9 अरब डॉलर (करीब 65,000 करोड़ रुपये) की बचत हुई. रूस से सस्ता कच्चा तेल मिलने की वजह से भारत का तेल बिल कम रहा और चालू खाते को नियंत्रित करने में सहायता मिली.

बचा दें कि रूसी कच्चा तेल, पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं (जैसे मिडिल ईस्ट) की तुलना में औसतन 11 से 16% तक सस्ता मिलता है. 

रूस भारत को डिस्काउंट पर कच्चा तेल बेचता है, जो वैश्विक बाजार मूल्य (ब्रेंट क्रूड) से प्रति बैरल 4-5 डॉलर कम होता है. 2022 से 2025 तक रूसी तेल की औसत कीमत 65-75 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि ब्रेंट क्रूड की कीमत 80-85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी.

सऊदी अरब और इराक जैसे देश ब्रेंट क्रूड के करीब या उससे थोड़ा कम कीमत पर तेल बेचते हैं, यानी 80-85 डॉलर प्रति बैरल. अमूमन सऊदी तेल रूसी तेल से 10-15% महंगा हो जाता है.

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अगर भारत मध्य पूर्व से समान मात्रा में तेल खरीदता है तो प्रति बैरल 4-5 डॉलर के अतिरिक्त खर्च के कारण सालाना अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ  भारत पर पड़ेगा. उदाहरण के लिए 20 लाख बैरल प्रतिदिन के आयात पर 4 डॉलर प्रति बैरल का अंतर सालाना ~2.9 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च बनता है.

मध्य पूर्व से सप्लाई पर लॉजिस्टिक समस्या

मध्य पूर्व से तेल की आपूर्ति हमेशा से भारत के लिए रणनीतिक और लॉजिस्टिक समस्या लेकर आती है.

पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कहा है कि अन्य देशों से तेल की आपूर्ति संभव है, लेकिन यह महंगा होगा और लॉजिस्टिक्स की चुनौतियां बढ़ सकती हैं. पश्चिम एशिया में जंग की वजह से वैश्विक तेल आपूर्ति पहले से ही अस्थिर है. हाल ही में जब ईरान पर इजरायल ने हमला किया था तो ईरान ने होरमूज जलडमरूमध्य मार्ग को बंद करने की धमकी दी थी. ऐसी स्थिति में भारत के लिए समस्या पैदा हो सकती है. 

रूसी तेल की डिलीवरी लागत भी अपेक्षाकृत कम है क्योंकि रूस भारत को समुद्री मार्गों (जैसे ब्लैक सी और बाल्टिक रूट्स) के जरिए तेजी से आपूर्ति करता है.