मध्यप्रदेश की चार कृषि उपजों सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर, छत्रिय धान को मिला जीआई टैग

भोपाल

प्रदेश में कृषि कल्याण वर्ष के चलते जब किसानों की समृद्धि पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है मध्य प्रदेश को एक बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। मध्यप्रदेश की चार कृषि उपजों सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर एवं छत्रिय धान को जीआई टैग मिल गया है। महाकौशल के किसानों ने प्रसन्नता जाहिर की है। इन कृषि उत्पादों को वैश्विक पहचान मिलेगी। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार किसानों की आर्थिक समृद्धि बढ़ाने के लिए संकल्पित है। उनकी आय दोगुनी करने के लिए विशेष कार्यक्रम बनाए जा रहे हैं। जैविक, प्राकृतिक एवं परंपरागत खेती के संरक्षण एवं संवर्धन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के मार्गदर्शन एवं मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के सहयोग तथा जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय, जबलपुर के तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रयासों से प्रदेश की चार विशिष्ट कृषि उपजों—सिताही कुटकी, नागदमन कुटकी, बैगानी अरहर एवं छत्रिय धान—को भोगौलिक संकेतक मिलना एक बड़ी उपलब्धि है।

अब इन उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी । जीआई टैग मिलने से इन कृषि उपजों को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। उनकी ब्रांड वैल्यू एवं बाजार प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि होगी तथा किसानों को बेहतर मूल्य मिलने के साथ कृषि निर्यात को भी प्रोत्साहन मिलेगा।

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ये चारों कृषि उपजें प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों से संबंधित हैं। इससे विशेष रूप से महाकौशल क्षेत्र के किसानों को व्यापक लाभ मिलेगा। इन उत्पादों की राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग बढ़ने से किसानों की आय में वृद्धि होगी, क्षेत्र की पारंपरिक कृषि पद्धतियों एवं जैव-विविधता का संरक्षण होगा तथा कृषि आधारित प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं निर्यात को गति मिलेगी।

पूर्व सीहोर शरबती गेहूं एवं रीवा सुन्दरजा आम को जीआई टैग दिलाने में किसान कल्याण विभाग एवं मध्यप्रदेश राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

यह उपलब्धि प्रदेश की कृषि विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने के साथ किसानों की आय बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

किसान कल्याण तथा कृषि विकास मंत्रीऐन्दल सिंह कंसाना ने प्रसन्नता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि अन्य उपजों को भी जी आई टैग दिलवाने की पहल की जायेगी।

भविष्य में भी प्रदेश की अन्य विशिष्ट कृषि उपजों के जीआई पंजीयन के लिए निरंतर कार्य करते रहेंगे।

श्री निशांत वरवड़े, सचिव, किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग ने कहा कि जीआई टैग प्राप्त होने से विशेष रूप से महाकौशल क्षेत्र के किसानों को नए बाजार, बेहतर मूल्य एवं निर्यात के अवसर प्राप्त होंगे। मंडी बोर्ड भविष्य में भी प्रदेश की अन्य विशिष्ट कृषि उपजों के जीआई पंजीयन एवं विपणन संवर्धन के लिए सक्रिय सहयोग प्रदान करता रहेगा।“ , राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड के प्रबंध संचालककुमार पुरुषोत्तम ने कहा कि मंडी बोर्ड ऐसे रचनात्मक और किसानों को आर्थिक लाभ पहुंचाने वाले कार्यक्रम में सक्रिय सहयोग करता रहेगा।

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सिताही कुटकी

सिताही कुटकी एक कम अवधि (60 दिन) वाली 'लिटिल मिलेट' (छोटी बाजरा) की देशी किस्म है। यह वर्षा-आधारित क्षेत्रों और देर से बुवाई की स्थितियों के लिए उपयुक्त है। यह सूखे की मार, नमी की कमी, और प्रमुख कीटों (शूट फ्लाई), 'ग्रेन स्मट' व 'ब्राउन स्पॉट' जैसी बीमारियों का सामना करने में सक्षम है। इस प्रकार, यह किसानों को एक स्थिर पैदावार दिलाने में मददगार साबित होती है। सिताही कुटकी की मध्यम ऊँचाई और मोटे तने के कारण फसल के गिरने की समस्या नहीं रहती। इसे पहाड़ी, ऊबड़-खाबड़ तथा कमज़ोर मिट्टी वाली स्थितियों में भी उगाया जा सकता है। डिण्डोरी के 'बैगा' तथा 'गोंड' जनजातियों के किसानों के लिए अच्छी आय दे सकती है।

डिंडोरी में 'सिताही कुटकी' की खेती की 10,395 हेक्टेयर क्षेत्र में बढ़ोतरी और 10-11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की स्थिर पैदावार से इस क्षेत्र में लोगों की आजीविका, भोजन और पोषण सुरक्षा में मदद मिली है। जनजातीय ज़िलों के लगभग 60,000 आदिवासी किसान—खासकर डिंडोरी, मंडला, अनूपपुर, छिंदवाड़ा, शहडोल, उमरिया, बालाघाट और जबलपुर के कुछ हिस्सों के किसान पैदावार बढ़ाकर आर्थिक ले सकते हैं। डिंडोरी के पहाड़ी और मुश्किल इलाकों के 54 गाँवों के किसानों को मुनाफ़ा हुआ है। इन इलाकों में दूसरी रबी फ़सलों की खेती नहीं होती।

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नागदमन कुटकी

नागदमन कुटकी डिंडोरी जिले में उगाई जाने वाली कुटकी की एक विशिष्ट स्थानीय किस्म है। यह अपने औषधीय गुणों और उच्च पोषण मूल्य के लिए जानी जाती है।

बैंगनी अरहर दरअसल अरहर की विशेष किस्म है। इसमें पौधे या फलियों पर बेंगनी रंग की झलक हेती है। इसमें भरपूर प्रोटीन होता है। रोगों से लड़ने की जबरदस्त क्षमता होती है। अच्छी देखभाल होने पर 15 से 20 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन हो सकता है।