पामगढ़ के स्कूल में बच्चों की सुरक्षा और सेहत के साथ सरेआम खिलवाड़, बच्चों की मौजूदगी में चलाएँ जा रहे बड़े-बड़े वाहन, जिम्मेदार अधिकारी मौन

जांजगीर जिला के पामगढ़ में प्रशासन के नाक के नीचे स्कूल परिसर को पाटने के नाम पर मासूम बच्चों की सेहत और सुरक्षा के साथ जमकर खिलवाड़ किया जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चों की मौजूदगी के बीच स्कूल परिसर में सरपंच द्वारा बड़े-बड़े वाहन चलाए जा रहे हैं | वही इस संबंध में कोई भी जिम्मेदार अधिकारी अपनी जवाबदेही तय नहीं कर रहा है। सभी अधिकारी मीडिया के सामने कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं। मामला शासकीय स्कूल मुलमुला का है।

पामगढ़ विकासखंड के ग्राम मुलमुला में संचालित शासकीय हाई स्कूल परिसर में बरसात के समय पानी भर जाता था| जिसे लेकर स्कूल प्रबंधन ने सरपंच से इसे पटवाने की मांग की थी। सरपंच द्वारा नियमों को ताक में रखकर स्कूल परिसर को मिट्टी मुरुम की जगह राखड़ से पाटना शुरू कर दिया है। स्कूल परिसर को राखड़ से लगभग 2 से 3 फीट तक पाटना शुरू कर दिया है। इस संबंध में जब सरपंच से जानकारी लेनी चाहिए तो सरपंच का कहना है कि पूरे अधिकारियों के सहमतियों के बाद हम स्कूल परिसर को राखड़ से पाट रहे हैं। इस संबंध के दस्तावेज दिखाने की बात पर सरपंच टाल गए। जबकि इससे संबंधित सभी अधिकारी कुछ भी जानकारी होने से इंकार कर रहे हैं | जो अपने आप में एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है|

 

ब्लॉक के एसडीएम, तहसीलदार और जनपद के सीईओ किसी को भी इसकी जानकारी नहीं है| जबकि किसी भी स्थान पर राखड़ डालने से पहले ऊपर से नीचे तक के सभी स्तर के अधिकारीयों की अनुमति प्रमाण-पत्र समेत लेनी होती है| लेकिन स्कूल जैसे संवेदनशील जगह पर बिना किसी जानकारी के धड़ल्ले से इसे डाला जा रहा है| स्कूल में छोटे-बड़े सैकड़ों बच्चे कमरे के अंदर पढाई कर रहे हैं | साथ ही आसपास बड़ी संख्या में लोग भी निवास कर रहे हैं| इसके बावजूद राखड़ को वातावरण में घोला जा रहा है| लेकिन इन सब से विकास खण्ड के जिम्मेदार अधिकारीयों और जनप्रतिनिधियों को कोई प्रभाव नहीं पड़ता |

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सरपंच द्वारा स्कूल संचालन के दौरान स्कूल परिसर में बड़े-बड़े वाहनों को घुसाया जा रहा है। जिसमें बड़े-बड़े हाईवा और जेसीबी मशीन शामिल है। इस परिसर में छोटे-छोटे बच्चे खेलते रहते हैं। जिससे कभी भी किसी बड़ी दुर्घटना से इंकार नहीं किया जा सकता। साथ ही राखड़ में खेलने और स्कूल क्षेत्र में राखड़ के उड़ने से उनकी सेहत के साथ भी खिलवाड़ किया जा रहा है।

 

राखड़ की धुल के बीच में बच्चों का मध्यान भोजन

स्कूल परिसर में चारों तरफ राखड़ फैला हुआ है | बड़े-बड़े हाईवा वाहनों से कुछ ही दूर में राखड़ की अनलोड किया जा रहा है| वहीँ स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के लिए मध्यान भोजन का तैयार किया जा रहा है| हवा में उड़ते हुए राखड़ खाना में ना पड़े या बच्चों के खाने के दौरान भोजन में राखड़ ना पहुंचे यह कैसे संभव है | इस स्कूल में बच्चों के सेहत की बातें सिर्फ भाषण और कागज़ तक ही सीमित कर दी गई है|

 

 

बीईओ ने माना यह गलत है बच्चों की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी

विकासखंड शिक्षा अधिकारी रामेंद्र जोशी ने कहा कि उन्हें मामले की जानकारी आज ही हुई है। उन्होंने स्कूल से पूरे मामले की जानकारी के साथ प्रतिवेदन लेने की बात कही है। बीईओ ने स्पष्ट किया कि फ्लाई ऐश बच्चों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है और स्कूल परिसर में राखड़ से समतलीकरण करना गलत है। बीईओ के इस बयान के बाद अब यह जांच जरूरी हो गई है कि स्कूल परिसर में फ्लाई ऐश डंपिंग किसके निर्देश या अनुमति से हुई और इस दौरान स्कूल के बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या व्यवस्था की गई थी।

 

कैंसर भी हो सकता है : पूर्व बीएमओ पामगढ़ डॉ. सौरभ यादव

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पामगढ़ के चिकित्सक और पूर्व खण्ड चिकित्सा अधिकारी डॉ. सौरभ यादव ने बताया की राखड़ के महीन कण मानव और पशुओं के शरीर में प्रवेश कर साँस नली को पहले प्रभावित करती है|जिससे अस्थमा और श्वास संबंधी बीमारी जो जन्म देता है|साथ ही पेड़-पौधों, फसलो पर भी नुकसान पहुंचता है| जल के स्रोत जैसे तालाब, कुएं नदी के पानी में पहुंचकर पानी में रहने वाले जीवों को भी नुकसान पहुंचता है| इस पानी का सेवन करने से कैंसर तक की बीमारी हो सकती है|

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राखड़ से लाइलाज फेफड़ों की बीमारी, विकलांगता और मृत्यु का कारण : संयुक्त राज्य अमेरिका

संयुक्त राज्य अमेरिका सरकार की एक आधिकारिक वेबसाइट OSHA में इसे बहुत अच्छे तरीके से प्रमाणित किया है | वहाँ से रिसर्च में पाया गया है की राखड़ के बहुत छोटे (“श्वसनीय”) क्रिस्टलीय सिलिका कणों को सांस के साथ अंदर लेने से सिलिकोसिस सहित कई बीमारियां हो सकती हैं, जो एक लाइलाज फेफड़ों की बीमारी है और विकलांगता और मृत्यु का कारण बन सकती है। श्वसनीय क्रिस्टलीय सिलिका फेफड़ों के कैंसर, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और गुर्दे की बीमारी का भी कारण बनती है। श्वसनीय क्रिस्टलीय सिलिका के संपर्क में आने से ऑटोइम्यून विकार और हृदय संबंधी विकार विकसित होने का खतरा भी बढ़ जाता है। ये व्यावसायिक बीमारियां जीवन को बदल देने वाली और दुर्बल करने वाली बीमारियां हैं जो संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रतिवर्ष हजारों श्रमिकों को प्रभावित करती हैं।

सिलिकोसिस

क्रिस्टलीय सिलिका की धूल सांस के जरिए अंदर लेने से सिलिकोसिस हो सकता है, जो गंभीर मामलों में विकलांगता या मृत्यु का कारण भी बन सकता है। सिलिका की धूल फेफड़ों में प्रवेश करने पर वहां निशान ऊतक (स्कार टिश्यू) बना देती है, जिससे फेफड़ों के लिए ऑक्सीजन ग्रहण करना मुश्किल हो जाता है। सिलिकोसिस का कोई इलाज नहीं है।

सिलिकोसिस आमतौर पर सांस लेने योग्य क्रिस्टलीय सिलिका के व्यावसायिक संपर्क में 15-20 वर्षों के बाद होता है। लक्षण स्पष्ट हो भी सकते हैं और नहीं भी; इसलिए, श्रमिकों को फेफड़ों की क्षति का पता लगाने के लिए छाती का एक्स-रे करवाना आवश्यक है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, श्रमिक को व्यायाम करने पर सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। बाद के चरणों में, श्रमिक को थकान, अत्यधिक सांस फूलना, सीने में दर्द या श्वसन विफलता का अनुभव हो सकता है।

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सिलिकोसिस रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है, इसलिए सिलिका के संपर्क में आने से तपेदिक जैसे फेफड़ों के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, धूम्रपान से फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है और सिलिका की धूल में सांस लेने से होने वाले नुकसान में और इजाफा होता है।

कुछ दुर्लभ मामलों में, सांस लेने योग्य क्रिस्टलीय सिलिका की बहुत अधिक सांद्रता के संपर्क में आने वाले व्यक्तियों में सिलिकोसिस के विशिष्ट लक्षण, साथ ही बुखार और वजन में कमी, वर्षों के बजाय कुछ ही हफ्तों में विकसित हो सकते हैं। ऐसे मामलों में, जितनी जल्दी हो सके चिकित्सा जांच करानी चाहिए।

फेफड़े का कैंसर

श्वसनीय क्रिस्टलीय सिलिका के संपर्क में आने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। फेफड़ों का कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसमें असामान्य कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़कर ट्यूमर का रूप ले लेती हैं और फेफड़ों के कार्य में बाधा डालती हैं। ये असामान्य कैंसर कोशिकाएं शरीर के अन्य हिस्सों में भी फैल सकती हैं और उन्हें नुकसान पहुंचा सकती हैं। अधिकतर मामलों में इसका इलाज संभव नहीं है।

क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी)

श्वसनीय क्रिस्टलीय सिलिका के संपर्क में आने से फेफड़ों की अन्य बीमारियों, मुख्य रूप से सीओपीडी (जिसमें एम्फीसेमा और क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस शामिल हैं) का खतरा बढ़ जाता है। सीओपीडी का मुख्य लक्षण फेफड़ों में हवा भरने में कठिनाई के कारण सांस फूलना है। सीओपीडी आमतौर पर ठीक नहीं हो सकती और समय के साथ बिगड़ सकती है।

गुर्दा रोग

श्वसनीय क्रिस्टलीय सिलिका के संपर्क में आने वाले श्रमिकों पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि इन श्रमिकों में गुर्दे की बीमारी विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, उच्च सिलिका एक्सपोज़र वाले श्रमिकों में गुर्दे की विफलता देखी गई है, जैसे कि अपघर्षक ब्लास्टर जो सिलिकोसिस से भी पीड़ित थे।