बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जी का छत्तीसगढ़ की धरती से बहुत गहरा नाता रहा है| जांजगीर चाम्पा में सिस्टम से सताएं लोगों में नई रौशनी लाने और अपने हक अधिकार के लिए लड़ना भी सिखाया| बीएसपी के उदय का गढ़ भी यही से होकर ही उत्तर प्रदेश पहुंचा था| आज उनके पूण्यतिथि पर कुछ जांजगीर जिले से जुडी हुई किस्से के बारे में चर्चा करेंगे|
कांशीराम जी का छत्तीसगढ़ प्रवास 1982 में राम नाम समाज के गुहा राम जी के निमंत्रण पर हुआ. कांशी राम ने दिल्ली में मीटिंग बुलाई थी. मीटिंग के दौरान एक ऐसे व्यक्ति को देखा जिसके पूरे शरीर मे राम नाम का गोदना लिखा हुआ था. कांशीराम ने उनके बारे में जानकारी मांगी. जब पता चला कि वो छत्तीसगढ़ से आए है तो उनको छत्तीसगढ़ आने की इच्छा जगी. गुहा राम जी के निमंत्रण पर पहली बार सारंगढ के पास छिंद गांव में आयोजित राम नामी मेला में वो शामिल हुए. इस दौरान कांशीराम छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में घूमे. लोगों से जन संपर्क किया. इसके बाद ही उन्होने ये ठाना कि जांजगीर चांपा में बहुजन समाज के लिए कुछ किया जाए. और साल 1984 में इस लोक सभा सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप मे चुनावी मैदान में उतरे. चुनाव में 32 हजार के करीब वोट भी हासिल किया. कांशीराम ने कहा कि आगे कितना वोट मिलेगा ये कहना जल्दबाजी होगी लेकिन लोगों का विश्वास हमपर बना है.
1984 में कांशीराम जी चुनाव मैदान में उतरे तो सीमित संसाधन थे, दीवाल में कार्यकर्ता ही पेंट कर पोस्टर लिखते थे. बबूल के दातुन से ब्रश बना कर वाल पेंटिंग की जाती थी. प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह के साथ नारा लिखा जाता था. नारे में लिखा जाता था बसपा आई है नई रोशनी लाई है. बीएसपी की क्या पहचान नीला झंडा हाथी निशान जैसे नारे लिखे जाते. पहली बार के चुनाव में 32 हजार वोट कांशीराम जी को प्राप्त हुए. कार्यकर्ता साइकल में चुनाव प्रचार किया करते थे. कांशीराम जी के लिए कार किराए पर लिया गया था. कार से कांशीराम जी जांजगीर चाम्पा लोक सभा का दौरा करते थे. जांजगीर चाम्पा लोक सभा में पहले कोरबा भी आता था वहीं मस्तूरी और सीपत भी शामिल थे. भारी संघर्ष किया लेकिन अब AC गाड़ी में चलने के बाद भी कोई परिणाम नहीं मिलता है. पहले नीला गमछा और साइकल वालों कि रैली देखने लोगों का हुजूम उमड़ता था.
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और समाज सुधारक कांशीराम जी की 9 अक्टूबर को पुण्यतिथि है। आइए जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने पहलुओं के बारे में।
पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था कांशीराम का जन्म
कांशीराम जी का जन्म 15 मार्च 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले में हुआ था। बताया जाता है कि कांशीराम जब पुणे की गोला बारूद फैक्ट्री में नियुक्त हुए थे, तो उस दौरान उन्हें पहली बार जातिगत आधार पर भेदभाव झेलना पड़ा। इस घटना का उनके जीवन पर गहरा असर पड़ा और उन्होंने साल 1964 में दलितों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी। वह बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की किताब “एनीहिलिएशन ऑफ कास्ट” से काफी प्रभावित हुए। शुरुआत में तो उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) का समर्थन किया, मगर बाद में इससे उनका मोहभंग हो गया।
‘चमचा युग’ किताब ने बटोरीं थी काफी सुर्खियां
साल 1971 में उन्होंने अखिल भारतीय एससी, एसटी-ओबीसी और अल्पसंख्यक कर्मचारी संघ की स्थापना की। साल 1978 में यह बामसेफ बन गया, इसका उद्देश्य अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़ा वर्गों और अल्पसंख्यकों के शिक्षित करना था। हालांकि, पार्टी की स्थापना से पहले ही उनकी किताब ‘चमचा युग’ ने काफी सुर्खियां बटोरीं। उन्होंने इस किताब में कई बड़े दलित नेताओं को चमचा बताया। उन्होंने तर्क दिया कि दलितों को अन्य दलों के साथ काम करके अपनी विचारधारा से समझौता करने के बजाय अपने स्वयं के समाज के विकास को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक रूप से काम करना चाहिए।
कांशीराम ने रखीं थी बसपा की नींव
कांशीराम जी ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की नींव रखी। उन्होंने अपना पहला चुनाव साल 1984 में छत्तीसगढ़ की जांजगीर-चांपा सीट से लड़ा था। लेकिन, बसपा को बड़ी सफलता उत्तर प्रदेश में मिली। साल 1991 के आम चुनाव में कांशीराम और मुलायम सिंह ने गठबंधन किया और कांशीराम ने इटावा से चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज की।
होशियारपुर से जीतकर दूसरी बार संसद पहुंचे थे कांशीराम
इसके बाद कांशीराम ने 1996 में होशियारपुर से 11वीं लोकसभा का चुनाव जीता और दूसरी बार लोकसभा पहुंचे। कांशीराम ही थे, जिन्होंने मायावती को राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया। अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए साल 2001 में मायावती को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उत्तर प्रदेश में जितनी बार भी बसपा की सरकार बनी, उन्होंने खुद को आगे बढ़ाने के बजाए मायावती को ही आगे किया।
कांशीराम ने दलित समाज के हित में काम करने का उठाया था बीड़ा
कांशीराम जी को बहुजन नायक, मान्यवर या साहेब जैसे कई नामों से जाना गया। 20 सदी के अंतिम दशक में कांशीराम भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में एक ऐसा चमकता हुआ सितारा बन गए, जिन्होंने दलित समाज के हित में काम करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने मायावती को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनवाया, मगर खुद कभी कोई पद नहीं लिया। दलितों के नायक कांशीराम ने 9 अक्टूबर 2006 को इस संसार को अलविदा कह दिया।
कांशीराम ने ‘चमचा युग’ किताब लिखकर खोल दी थी राजनेताओं की पोल
80 के दशक में एक किताब बाजार में आई, जिसने न केवल भारतीय राजनीति में दलितों के पहलुओं पर बात की, बल्कि कई दलित नेताओं की पोल को भी खोलकर रख दिया। इस किताब में जिस शब्द का सबसे अधिक बार इस्तेमाल किया गया वह था ‘चमचा’, किताब का नाम था ‘चमचा युग’ और इसे लिखा था बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम ने।
मान्यवर कांशीराम, अपने हक़ के लिए लड़ना होगा, उसके लिए गिड़गिड़ाने से बात नहीं बनेगी