एमपी नगर में बनेगा नया खाद्य भवन, 50 साल पुराने 150 पेड़ काटने की योजना, करेंगे ‘चिपको आंदोलन’

भोपाल 

राजधानी भोपाल के एमपी नगर क्षेत्र में प्रस्तावित खाद्य भवन के निर्माण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस परियोजना के तहत करीब 150 पुराने पेड़ों को काटने की तैयारी है, जिनमें पीपल और बरगद जैसे बड़े और छायादार वृक्ष शामिल हैं। इन पेड़ों की उम्र 40 से 50 साल से अधिक बताई जा रही है। पेड़ों की कटाई के विरोध में अब कर्मचारी संगठनों के साथ पर्यावरणविद् भी मैदान में उतर आए हैं।

जानकारी के मुताबिक, वेयर हाउसिंग कॉर्पोरेशन द्वारा करीब 64 करोड़ रुपये की लागत से एक नया 6 मंजिला खाद्य भवन बनाने की योजना तैयार की गई है। इस भवन में खाद्य संचालनालय, वेयर हाउसिंग और नाप-तौल विभाग के दफ्तरों को एक ही परिसर में शिफ्ट किया जाना है। सभी सुविधाओं को मिलाकर कुल खर्च 90 से 100 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।

यह निर्माण एमपी नगर स्थित नाप-तौल नियंत्रक कार्यालय की लगभग डेढ़ एकड़ जमीन पर प्रस्तावित है। इसी परिसर में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन और प्रयोगशालाओं के लिए भी बड़ा क्षेत्र आरक्षित है। पुराने भवन को तोड़कर नया निर्माण किया जाएगा, जिसके चलते परिसर में मौजूद सैकड़ों पेड़ों को हटाया जाना तय माना जा रहा है।

नए भवन के लिए टेंडर हो चुके जारी हाल ही में वेयर हाउसिंग द्वारा नए ‎भवन के निर्माण के लिए एजेंसी‎ चुनने टेंडर जारी कर दिए हैं।‎ नाप-तौल नियंत्रक कार्यालय एमपी‎ नगर में जिला उद्योग केंद्र के पास ‎लगभग डेढ़ एकड़ जमीन पर स्थित ‎है। मुख्य भवन के अलावा काफी‎ बड़ा क्षेत्र टैंक लारी कैलिब्रेशन और‎ दूसरी प्रयोगशाला के लिए छोड़ा गया‎ है। इसी जमीन पर पुराने भवन को‎ तोड़कर नया खाद्य भवन बनेगा। जिसके लिए पेड़ों को भी काटा‎ जाएगा। पीपल, बरगद सहित परिसर‎में 40 से 50 साल पुराने लगभग‎ 150 पेड़ हैं।‎

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एक विभाग के लिए इतना खर्च ठीक नहीं तिवारी ने बताया कि नागरिक आपूर्ति निगम को छोड़कर सभी विभागीय दफ्तरों के सरकारी भवन‎ हैं। सिर्फ नान के लिए 100 करोड़ रुपए का खर्च ठीक नहीं है। ‎परिसर के 150 पेड़ भी काटे जाएंगे। 3 साल में भवन बनने‎ पर मुख्यालय को लाखों रुपए किराए के देने होंगे। विभाग के‎ सभी स्टाफ गुरुवार से काली पट्टी लगाकर काम करेंगे। वहीं, भोजन‎ अवकाश में विरोध करेंगे।

सात साल पहले अपने दफ्तर बाहर भेजे‎ जगह की कमी बताकर 7 साल पहले नाप तौल मुख्यालय से‎ उप नियंत्रक व निरीक्षक कार्यालय 50 लाख खर्च कर जेके ‎रोड क्षेत्र में 5 हजार वर्गफीट के दफ्तर में भेजे थे। कर्मचारियों‎ के मुताबिक यहां स्टाफ के बैठने और जब्त सामान रखने के‎लिए बमुश्किल जगह है। मुख्यालय में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन‎ सुविधा बनाने 5 करोड़ की स्वीकृति मांगी जा चुकी है।‎

इस फैसले के खिलाफ मप्र नाप-तौल अधिकारी-कर्मचारी संघर्ष समिति ने मोर्चा खोल दिया है। समिति के अध्यक्ष उमाशंकर तिवारी ने बताया कि गुरुवार को भोजन अवकाश के समय कर्मचारी और पर्यावरण से जुड़े लोग पेड़ों से चिपककर ‘चिपको आंदोलन’ करेंगे। विरोध के प्रतीक स्वरूप कर्मचारी काली पट्टी बांधकर काम करेंगे।

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कर्मचारियों का कहना है कि नागरिक आपूर्ति निगम (नान) को छोड़ दें तो बाकी सभी विभागों के पास पहले से अपने सरकारी भवन हैं। ऐसे में केवल एक विभाग के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करना और इसके बदले 150 पेड़ों की बलि देना पूरी तरह अनुचित है। साथ ही, नए भवन के निर्माण में करीब तीन साल लगेंगे, इस दौरान मुख्यालय को किराए के भवन में शिफ्ट करना पड़ेगा, जिससे लाखों रुपये अतिरिक्त खर्च होंगे।

कर्मचारियों ने यह भी बताया कि करीब सात साल पहले जगह की कमी का हवाला देकर नाप-तौल मुख्यालय से कुछ कार्यालयों को 50 लाख रुपये खर्च कर जेके रोड स्थित किराए के भवन में भेजा गया था, जहां आज भी स्टाफ और जब्त सामग्री के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। वहीं, मुख्यालय परिसर में टैंक लॉरी कैलिब्रेशन सुविधा विकसित करने के लिए पहले ही 5 करोड़ रुपये की स्वीकृति मांगी जा चुकी है।

अब पेड़ों की कटाई और भारी खर्च को लेकर विरोध तेज होता जा रहा है। पर्यावरणविदों का कहना है कि शहर में पहले ही हरियाली लगातार कम हो रही है, ऐसे में पुराने और बड़े पेड़ों को बचाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। आंदोलन को देखते हुए आने वाले दिनों में यह मामला और तूल पकड़ सकता है।

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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पेड़ काटने पर लगाई है रोक

पत्रकार गौरव चतुर्वेदीने बताया कि "मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कुछ माह पहले ही आदेश जारी करते हुए पेड़ों की कटाई पर रोक लगाई थी. इसमें यह भी कहा गया था कि हाईकोर्ट के बगैर आदेश के राजधानी भोपाल में एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा. यह रोक हाईकोर्ट ने इसलिए लगाई थी कि भोपाल में ही हजारों पेड़ काटने का मामला सामने आया था. जिसमें कोर्ट ने कहा था कि मध्य प्रदेश में अवैध तरीके से पेड़ों की कटाई बंद होनी चाहिए. कुछ रिपोर्टर्स के अनुसार मध्य प्रदेश में 408 वर्गफीट जंगल कम हुए हैं,जो कि चिंता विषय है."