हाई कोर्ट के फैसले के दो माह बाद बदली भोजशाला की तस्वीर, विकास कार्यों और धार्मिक गतिविधियों को मिली रफ्तार

धार
 मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के 15 मई के ऐतिहासिक फैसले के बाद दो माह में धार स्थित भोजशाला परिसर का स्वरूप काफी बदल गया है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद से यहां नियमित पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हुआ, जो लगातार जारी है। प्रतिदिन सुबह और शाम आरती हो रही है। बीते दो महीनों में यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि हुई है।

नियमित पूजा-अर्चना से बढ़ी आस्था
हाई कोर्ट के फैसले से पहले की व्यवस्था के अनुसार प्रत्येक शुक्रवार को परिसर में होने वाली नमाज नहीं कराई जाती, जबकि प्रत्येक मंगलवार को होने वाली विशेष पूजा अब भी की जाती है। इन दो महीनों में भोजशाला में नियमित पूजा-अर्चना की व्यवस्था ही स्थापित नहीं हुई, बल्कि धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक गतिविधियों और प्रस्तावित विकास योजनाओं को भी नई गति मिली है।

सरस्वती लोक परियोजना को मिली गति
हाई कोर्ट के निर्णय के 10 दिन बाद ही 25 मई को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भोजशाला का दौरा किया था। उन्होंने परिसर के समग्र विकास के लिए 'सरस्वती लोक' विकसित करने की घोषणा की। इसके साथ ही लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित मां सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाने के लिए हरसंभव प्रयास करने का भी आश्वासन दिया। मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद सरस्वती लोक परियोजना की प्रारंभिक प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। परियोजना के लिए ड्रोन सर्वे सहित अन्य तकनीकी सर्वे पूरे किए जा चुके हैं और विस्तृत कार्ययोजना तैयार की जा रही है।

पूजा व्यवस्था के लिए तैयार हो रही नई गाइडलाइन
हाई कोर्ट के फैसले के अनुरूप पूजा व्यवस्था को व्यवस्थित करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने दिशा-निर्देश तैयार कर लिए हैं। इन्हें स्वीकृति के लिए दिल्ली स्थित एएसआई मुख्यालय को भेजा गया है। अधिकारियों का कहना है कि स्वीकृति मिलने के बाद इन्हें लागू किया जाएगा। इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद अब प्रशासन न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप आगे की प्रक्रिया तय करने में जुटेगा।

भोजशाला में बनी हैं प्रतिमाएं
वहीं, उन्होंने कहा कि यहां साक्ष्य की क्या जरूरत है। मंदिर के खंभों के मूर्तियां बनी हुई है। यहां चांद पीठ और सूर्य पीठ बने हुए हैं। ये चीजें हिंदू और सनातन परंपरा में होती है। ऐसे में यह निश्चित रूप से हिंदू परंपरा का केंद्र रहा है। भोजशाला का हर साक्ष्य अपने आप में बोलता है। भोजाशाल में लगी शिलालेख भी इसकी गवाही देती है।

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गौरतलब है कि पिछले तीन दशकों से धार की भोजशाला को लेकर कई बार हिंसा की घटनाएं और कर्फ्यू जैसे हालात भी बन चुके हैं। हर साल बसंत पंचमी पर भोजशाला को लेकर दोनों पक्षों के बीच तनाव की स्थिति बनती है। अप्रैल 2003 में कोर्ट के निर्देशों के बाद धार की भोजशाला में प्रति मंगलवार को हिंदू समाज के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। जबकि शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज पढ़ने की अनुमति होती है। वसंत पंचमी पर हिंदू समाज को पूरे दिन पूजा-अर्चना की अनुमति होती है।

कोर्ट ने क्या दिए हैं आदेश
एमपी हाईकोर्ट ने भोजशाला मंदिर और कमाल मौला मस्जिद का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से पांच सदस्यीय पैनल सर्वेक्षण करेगा। रिपोर्ट छह हफ्ते में आने की उम्मीद है। हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने जांच में जीपीआर/जीपीएस सर्वेक्षण, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और कार्बन डेटिंग पद्धति को शामिल करने कहा है। अदालत ने कहा कि परिसर की रहस्यमयी आकृति, रूप और चरित्र के कारण जांच आवश्यक है। इसके अलावा, अदालत ने इस प्रक्रिया में शामिल दोनों विवादित समुदायों के प्रतिनिधियों के होने के महत्व पर जोर दिया।

सुप्रीम कोर्ट जाएंगे
धार शहर की मस्जिद के मुख्य मौलवी वकार सादिक ने घोषणा की कि मस्जिद प्रबंधन सुप्रीम कोर्ट में हाल ही में जारी आदेश को चुनौती देने की योजना बना रहा है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित 11वीं सदी का स्मारक भोजशाला हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के लिए धार्मिक महत्व रखता है। हिंदू इसे देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर मानते हैं, जबकि मुसलमान इसे कमाल मौला मस्जिद कहते हैं। एएसआई के आदेश के अनुसार, अप्रैल 2003 से हिंदू मंगलवार को पूजा कर रहे हैं और मुसलमान शुक्रवार को नमाज अदा कर रहे हैं।

मंदिर या दरगाह
वहीं, अदालत ने स्मारक अधिनियम, 1958 की धारा 16 पर ध्यान केंद्रित किया है, जिसका उद्देश्य पूजा स्थलों को दुरुपयोग, प्रदूषण और अपवित्रता से बचाना है। कोर्ट ने इस धारा के तहत इसके प्राथमिक उद्देश्य को समझने के लिए पूजा स्थल के चरित्र को निर्धारित करने के महत्व पर जोर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक पूजा स्थल का चरित्र या प्रकृति निर्धारित नहीं हो जाती, तब तक मंदिर का उद्देश्य रहस्य में डूबा रहता है। कोर्ट का निर्णय इन पवित्र स्थलों के उद्देश्य के बारे में स्थिति स्पष्ट करेगी।

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कोर्ट ने माना है कि स्मारक की प्रकृति और चरित्र को समझने और स्पष्ट करने की आवश्यकता है। उसने कहा है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की जिम्मेदारी है कि वह रहस्यों को उजागर करे और स्थल से जुड़े भ्रम को दूर करे। अदालत ने यह भी नोट किया है कि राज्य सरकार और ASI ने चल रहे विवाद और उससे निपटने से जुड़ी चुनौतियों को स्वीकार किया है। अदालत के अनुसार, स्मारक से जुड़ी उलझनों और परस्पर विरोधी कहानियों को सुलझाने का काम अदालत का नहीं, बल्कि ASI का है। अदालत की ये टिप्पणियां संबंधित पक्षों द्वारा प्रस्तुत तर्कों के दौरान की गईं।

800 वर्षों की परंपरा का दावा
​कमेटी के सदर जुल्फिकार पठान ने दावा किया कि, ''कमाल मौला मस्जिद में पिछले लगभग 800 वर्षों से नमाज अदा की जा रही है.'' उन्होंने कहा कि, ''इसी सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा और मस्जिद के स्वरूप के संरक्षण के लिए मुस्लिम समाज ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया था.'' वहीं भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा का कहना है कि, सर्वे में भोजशाला से मूर्तियां मिली थी. कोर्ट ने भी भोजशाला को मंदिर माना है. और जो सुप्रीम कोर्ट ने नमाज के लिए जगह की व्यवस्था करने की बात कही है हम उस फैसला का स्वागत करते हैं। 

क्या है धार भोजशाला का इतिहास
धार में स्थित भोजशाला का इतिहास 11वीं शताब्दी से शुरू होता है. धार में परमार वंश के मशहूर शासक राजा भोज ने साल 1034 में शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बनाने के लिए सरस्वती सदन बनवाया. इसे बाद में भोजशाला कहा गया. धार में राजा भोज ने 1000 से 1055 ईस्वी तक शासन किया. 24 अगस्त 1935 को धार दरबार ने नोटिफिकेशन जारी कर कहा था कि भोजशाला मस्जिद है और यहां मुस्लिम समाज नमाज पढ़ता रहेगा. सन 1990 में भोजशाला को लेकर तनाव बड़ा. सन् 1995 के बाद भोजशाला का विवाद और बढ़ने लगा. 1997 में विश्व हिंदू परिषद ने भोजशाला पर झंडा फहराने का ऐलान किया, जिसके बाद 12 मई 1997 को प्रशासन ने भोजशाला में आम लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी. तब प्रशासन ने हिंदुओं को बसंत पंचमी पर और मुसलमानों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी। 

धार भोजशाला का विवाद 2022 में उठा. हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से 2 मई 2022 को इंदौर हाई कोर्ट में याचिका लगाई गई. हिंदू पक्ष का कहना था कि, धार भोजशाला वाग्देवी देवी का मंदिर है. हिंदू पक्ष का आरोप है कि, 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला को तोड़ दिया था. भोजशाला की जांच के लिए कोर्ट ने निर्देश दिया था. जिस पर ASI ने 98 दिनों तक मंदिर में सर्वे किया था. 2100 पेज की रिपोर्ट इंदौर हाईकोर्ट में पेश की थी. जिसके बाद यह फैसला सुनाया गया. सर्वे के दौरान पुराने पत्थर और नक्काशी वाले टुकड़े भी मिले, जिनकी जांच की गई. कई मूर्तियां भी खुदाई के दौरान मिली थी। 

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कब क्या-क्या हुआ

    1997 में भोजशाला परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा, जिससे हिंदू समुदाय में असंतोष पैदा हुआ।
    2002 में बसंत पंचमी के दिन भोजशाला में हिंदू समुदाय के लोग जमा हो गए। इसके बाद कलेक्टर ने लाठी चार्ज के आदेश दिए, जिससे कई लोगों को चोट आई। इसके बाद भोजशाला आंदोलन जोर पकड़ने लगा।

    17 अप्रैल 2003 को एएसआई का नया आदेश आया। इसमें हर मंगलवार को हिंदुओं को भोजशाला परिसर में पूजा की अनुमति दी गई। शुक्रवार को मुसलमानों को नमाज अता करने की अनुमति। इसी साल भोजशाल के गेट पर एक लाख भक्त वसंत पंचमी के दिन पूजा करने पहुंच गए। इसके बाद प्रशासन गेट खोलने से मुकर गया। इसके बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, जिसमें 200 लोग घायल हुए।
    इस दौरान श्रद्धालुओं ने पुलिस की गाड़ी में आग लगा दी। साथ ही पुलिसकर्मियों की पिटाई भी कर दी। सरकारी आकलन के मुताबिक तीन करोड़ की सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ था।

    वहीं, तत्कालीन सीएम दिग्विजय सिंह के आदेश पर 1400 लोगों पर पुलिस की पिटाई मामले में केस दर्ज हुआ था। कई लोगों पर एनएसए लगाया गया था। साथ ही रिकवरी के लिए सरकार ने गैजेट नोटिफिकेशन जारी किया था। उमा भारती ने सीएम बनने के बाद सारे केस वापस ले लिए थे।

    2006 में भी वसंत पंचमी के दिन ऐसी ही स्थिति बन गई थी। वसंत पंचमी शुक्रवार के दिन पड़ा था। उस दिन मुस्लिम समाज के लोग वहां नमाज के लिए आए थे। उनमें विवाद हुआ और 100 से अधिक लोग घायल हो गए। इसके बाद दंगे भी हुए थे।
    2013 में भी शुक्रवार के दिन वसंत पंचमी पड़ा था। इस दिन पुलिस बहुत सख्त थी। साथ ही लोगों को कंट्रोल रखा।