मौत से जिंदगी तक: पहला ट्रांसप्लांट जिसने दुनिया को हिला दिया!

कनाडा

कनाडा ने चिकित्सा इतिहास में एक भयंकर और विवादास्पद मील का पत्थर तय किया है। देश में पहली बार Medically Assisted Death (MAiD) यानि चिकित्सकीय सहायता से मृत्यु  के माध्यम से मृत घोषित व्यक्ति का हृदय सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया। इस घटना में 38 वर्षीय ALS (अमायलोट्रॉफिक लेटरल स्क्लेरोसिस) रोगी को पहले इच्छा मृत्यु दी गई फिर उसकी मृत्यु के सिर्फ सात मिनट बाद उसका हृदय "पुनर्जीवित" किया गया और अमेरिका ले जाकर प्रत्यारोपित किया गया। यह घटना बेशक Organ Donation after Euthanasia (ODE) के क्षेत्र में कनाडा को विश्व में अग्रणी बनाती है लेकिन इसने एक नई बहस भी छेड़ दी है। 2021 तक वैश्विक ODE मामलों में 286 में से 136 कनाडा में हुए। 2024 में कनाडा में हुए सभी अंग प्रत्यारोपणों में 5% अंग MAiD से आए। इसका मतलब यह है कि अब कनाडा मृत्यु और अंगदान के बीच एक नई, विवादास्पद कड़ी स्थापित कर रहा है।

कनाडा के ओंटारियो प्रांत के 38 वर्षीय व्यक्ति, जो एएलएस (Amyotrophic Lateral Sclerosis) नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित थे, ने टोरंटो जनरल हॉस्पिटल में मेडिकल असिस्टेंस इन डाइंग (MAiD) प्रक्रिया के तहत स्वेच्छा से जीवन समाप्त करने का निर्णय लिया। उनकी मृत्यु के तुरंत बाद, उनका हृदय एयरलिफ्ट कर पिट्सबर्ग (अमेरिका) भेजा गया, जहां यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग मेडिकल सेंटर में एक 50 वर्षीय हृदय रोगी में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित (ट्रांसप्लांट) किया गया।

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 कनाडा आज विश्व में MAiD के बाद अंगदान करने वाले देशों में अग्रणी बन चुका है। केवल 2023 में ही 13,000 से अधिक MAiD मामले दर्ज किए गए। हालांकि, इस प्रथा को लेकर देश में नैतिकता और मानवाधिकारों पर गंभीर बहस छिड़ गई है। आलोचकों का कहना है कि ऐसी प्रक्रियाओं में सहमति (consent) की पारदर्शिता और कमजोर मरीजों पर संभावित मानसिक दबाव जैसे मुद्दे गहराई से जांच के योग्य हैं।

विशेषज्ञों की चेतावनी
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रणाली मानवाधिकारों और नैतिकता पर गंभीर सवाल उठाती है। ऐसे रोगी जो खुद को समाज या परिवार के लिए बोझ मानते हैं, वे “अर्थपूर्ण योगदान देने” के बहाने मृत्यु को अपनाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। अंगदान की इच्छा कभी-कभी मौत का निर्णय प्रभावित कर सकती है, जिससे कमजोर व्यक्तियों पर अप्रत्यक्ष दबाव बन सकता है। कनाडा की स्वास्थ्य नीति अब एक ऐसी स्थिति में पहुंच चुकी है जहां सबसे कमजोर लोगों की मृत्यु का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए किया जा रहा है। कनाडा की स्वास्थ्य एजेंसियों और नैतिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अंगदान की प्रक्रिया को MAiD के साथ जोड़ने से समाज में नैतिक और कानूनी जोखिम पैदा हो सकते हैं। कुछ आलोचकों का कहना है कि यह प्रणाली मौत को केवल उपयोगी साधन बनाने की ओर जा रही है। वैश्विक स्तर पर, विशेषज्ञों ने पूछा है कि क्या कनाडा की यह नीति मानवाधिकारों के लिए खतरा नहीं है।

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मानवाधिकार और नैतिकता पर बहस गरम  
इस मुद्दे पर सोशल मीडिय पर तीखी बहस छिड़ गई है।  Jason Gregor ने लिखा, “आप इस पोस्ट में कई अनुमान लगा रहे हैं। जब तक आप उनकी स्थिति में नहीं रहे, आपको अंदाजा नहीं है कि वे कैसा महसूस करते हैं। MAiD का उपयोग करने के लिए उन्हें स्वस्थ मानसिक स्थिति में होना जरूरी है। मृत्यु के बाद किसी की मदद करने का विकल्प होना उनके लिए स्वागतयोग्य हो सकता है। MAiD एक अविश्वसनीय विकल्प है।”

Sreliata ने लिखा, “ALS का कोई इलाज नहीं है और पीड़ा निश्चित है। मैं नहीं समझता कि जब तक व्यक्ति अपने सही मानसिक हाल में है, वह इस रास्ते को क्यों नहीं चुन सकता? असिस्टेड ‘सुसाइड’ के विरोधी वही होते हैं जिन्होंने कभी शारीरिक कष्ट नहीं झेला।”वहीं Tybernicus ने सवाल उठाया, “क्या कनाडा में किसी को उस समय दिल की ज़रूरत नहीं थी या उसे सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को बेचा गया? उस दिल के लिए कनाडा को कितना मिला? वह पैसा मृतक के परिवार को क्यों नहीं मिला?”

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Chokic ने लिखा, “मैंने भी असहनीय शारीरिक कष्ट झेला है, लेकिन मैं इसके खिलाफ हूं।”   Monica P ने कहा, “अगर ALS इतनी हालत बना दे कि जीना असंभव हो जाए, तो यह व्यक्ति का अधिकार है कि वह क्या करे। अगर वह अंगदान भी करना चाहे तो यह उसका निर्णय है। गूगल सर्च से पता चलता है कि इस बीमारी का अंत कितना भयानक होता है।” Van K Tran ने कहा, “इलाज खोजने की बजाय आप असिस्टेड सुसाइड चुनते हैं और अब इसमें एक ‘इंसेंटिव’ भी जुड़ गया है। इलाज शायद कभी न मिले, लेकिन यह रास्ता सवाल खड़े करता है।”

कनाडा का यह कदम केवल चिकित्सा उपलब्धि नहीं है, बल्कि समाज और नैतिकता के लिए एक बड़ा सवाल भी है।

    क्या अंगदान के नाम पर मौत को "उपयोगी" बनाना सही है?
    क्या कमजोर रोगियों को अप्रत्यक्ष दबाव में जीवन समाप्त करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है?
    यह बहस अब केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं रही।
    यह मानवाधिकार, नैतिकता और समाज की संवेदनशीलता पर गहराई से सवाल उठा रही है।