क्या अल-अक्सा मस्जिद पर कब्जे की तैयारी? अमेरिका-इजरायल के कथित प्लान से मचा बवाल

 यरुशलम

फिलिस्तीन के यरुशलम स्थित अल-अक्सा मस्जिद को लेकर एक नई राजनीतिक और धार्मिक लड़ाई छिड़ती दिखाई दे रही है. दावा किया जा रहा है कि अमेरिका और इजरायल मिलकर एक ऐसे नए प्लान पर काम कर रहे हैं, जिसके तहत अल-अक्सा मस्जिद पर जॉर्डन की दशकों पुरानी संरक्षक यानी कस्टोडियन की भूमिका को खत्म किया जा सकता है। 

रिपोर्ट के मुताबिक इस योजना को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर और इजरायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी आगे बढ़ा रहे हैं. हालांकि कुशनर फिलहाल अमेरिकी प्रशासन में किसी आधिकारिक पद पर नहीं हैं, लेकिन बताया जा रहा है कि वह पर्दे के पीछे सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। 

इस कथित प्रस्ताव के तहत जॉर्डन समर्थित इस्लामिक वक्फ की शक्तियां खत्म कर दी जाएंगी और उसकी जगह इजरायल सरकार की निगरानी में एक नया निकाय बनाया जाएगा. मिडिल ईस्ट आई की रिपोर्ट के मुताबिक, यह नया सिस्टम अल-अक्सा मस्जिद को "मल्टी-फेथ सेंटर" यानी बहुधार्मिक स्थल घोषित कर सकता है। 

रिपोर्ट्स में दावा है कि इसके बाद बड़े समूहों में यहूदियों को मस्जिद परिसर में प्रवेश और प्रार्थना करने की औपचारिक अनुमति दी जा सकती है. इतना ही नहीं, इजरायल को इमामों, धार्मिक उपदेशकों और मस्जिद प्रशासन से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति में भी बड़ा अधिकार मिल सकता है. यहां तक कि शुक्रवार के खुत्बों यानी धार्मिक भाषणों की सामग्री पर भी इजरायली दखल की बात कही जा रही है। 

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मीडिया ईस्ट आई ने सूत्रों के हवाले से बताया कि अमेरिका ने अल-अक्सा के भविष्य को लेकर एक ड्राफ्ट पेपर भी तैयार किया है. इसमें कथित तौर पर मस्जिद परिसर को उसकी मौजूदा मुस्लिम पहचान से अलग कर एक बड़े पर्यटन और धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने का विजन रखा गया है, जहां तीनों अब्राहमिक धर्मों – इस्लाम, ईसाई और यहूदी की मौजूदगी दिखाई जाए। 

इस पूरे विवाद के बीच जॉर्डन की चिंता सबसे ज्यादा बढ़ी हुई है. जॉर्डन का हाशमाइट शाही परिवार 1924 से यरुशलम के मुस्लिम और ईसाई धार्मिक स्थलों का संरक्षक माना जाता है. 1994 की जॉर्डन-इजरायल शांति संधि में भी इस भूमिका को मान्यता दी गई थी। 

फिलहाल अल-अक्सा मस्जिद एक पुराने "स्टेटस क्वो" समझौते के तहत संचालित होती है. 1967 की जंग के बाद तय व्यवस्था के मुताबिक मस्जिद के अंदरूनी मामलों को इस्लामिक वक्फ संभालता है, जबकि बाहरी सुरक्षा इजरायल के हाथ में रहती है. गैर-मुस्लिमों को सीमित समय के लिए परिसर में आने की इजाजत है, लेकिन वहां प्रार्थना करने की अनुमति नहीं है। 

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लेकिन बीते कुछ वर्षों में इजरायली पुलिस की कार्रवाई, दक्षिणपंथी यहूदी समूहों की बढ़ती मौजूदगी और यहूदी प्रार्थना अधिकारों की मांग ने माहौल को लगातार तनावपूर्ण बनाया है. फिलिस्तीनी और जॉर्डन के अधिकारी आरोप लगाते रहे हैं कि इजरायल धीरे-धीरे मौजूदा व्यवस्था को बदलने की कोशिश कर रहा है। 

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बहरीन, मिस्र, मोरक्को और यूएई को इस अमेरिकी प्रस्ताव की जानकारी दी गई है. हालांकि सऊदी अरब ने कथित तौर पर इस योजना पर आपत्ति जताई है. खाड़ी देशों के सूत्रों का कहना है कि सऊदी अरब मानता है कि अगर अल-अक्सा की मौजूदा संरक्षक व्यवस्था से छेड़छाड़ हुई तो पूरा पश्चिम एशिया भड़क सकता है। 

जॉर्डन सरकार ने साफ कहा है कि यरुशलम और उसके धार्मिक स्थलों को लेकर उसका रुख नहीं बदला है. उसने दोहराया कि हाशमाइट संरक्षकता अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संधियों से मान्यता प्राप्त है और इसे खत्म करने की किसी भी कोशिश का विरोध किया जाएगा। 

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इस बीच फिलिस्तीनी पक्ष ने भी इस कथित प्रस्ताव को पूरी तरह खारिज कर दिया है. उनका कहना है कि अल-अक्सा सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि मुस्लिम दुनिया की पहचान और क्षेत्रीय स्थिरता का अहम स्तंभ है। 

अब सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ कूटनीतिक दबाव की रणनीति है या फिर असल में अल-अक्सा मस्जिद की मौजूदा स्थिति बदलने की बड़ी तैयारी चल रही है. क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो इसका असर सिर्फ यरुशलम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत और पश्चिम एशिया की राजनीति में भूचाल ला सकता है।