डी-लिस्टिंग पर छिड़ी सियासी बहस, UD मिंज ने किया विरोध; अरविंद नेताम बोले- होकर रहेगी

रायपुर.

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में जनजाति सांस्कृतिक समागम के मंच पर डी-लिस्टिंग की मांग के बाद छत्तीसगढ़ में भी इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गई है. अन्य धर्म अपना चुके लोगों को एसटी सूची से बाहर करने की मांग की जा रही है. इस बहस में एक और समर्थन तो दूसरी तरफ खुलकर विरोध भी किया जा रहा है. 

देर-सवेर डी-लिस्टिंग होकर रहेगी : नेताम
छत्तीसगढ़ से इस मांग का वनवासी सुरक्षा मंच के बैनर तले पूर्व मंत्री गणेशराम भगत और सांसद भोजराम नाग नेतृत्व कर रहे हैं. बताया जा रहा है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविन्द नेताम भी कार्यक्रम में शिरकत करने वाले थे, लेकिन किसी कारण से वह नहीं जा पाए. उन्होंने डी-लिस्टिंग को लेकर कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर तैयारी की गई है और समाज की भावनाओं के अनुरूप यह मांग लगातार मजबूत हो रही है. देर-सबेर डी-लिस्टिंग होकर रहेगी. धर्मांतरण के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ में कड़े कानून की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं. अरविन्द नेताम ने कहा कि यह एक संवेदनशील विषय है, जो धीरे-धीरे राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है, इसलिए सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा.

See also  मंत्री नितिन गडकरी ने छत्तीसगढ़ में बीस हजार करोड़ रुपए की सड़क परियोजनाओं की स्वीकृति दी गई

डी-लिस्टिंग की मांग का विरोध
जशपुर में डी-लिस्टिंग की मांग का विरोध का माहौल है. पूर्व संसदीय सचिव यूडी मिंज और गीता उरांव के नेतृत्व में विरोध प्रदर्शन किया गया. यूडी मिंज का कहना है कि डी-लिस्टिंग की मांग संविधान की भावना के विपरीत है और इसे अनावश्यक राजनीतिक रंग दिया जा रहा है. धर्म परिवर्तन के बाद भी आदिवासी समाज की परंपराएं, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान खत्म नहीं होती है. जशपुर जिले में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय निवास करता है और समाज की पहचान उसके सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी हुई है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि कांग्रेस सरकार के दौरान रौतिया समेत अन्य समाजों को आदिवासी वर्ग में शामिल करने के लिए टीआरआई के माध्यम से प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था.

क्यो होती है डी-लिस्टिंग ?
आसान भाषा में डी-लिस्टिंग यानी लिस्ट से बाहर करना. आदिवासियों की इस मांग के सन्दर्भ में डीलिस्टिंग का मतलब, किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची से बाहर करना है.

See also  शहडोल दौर पर पहुंचे सीएम शिवराज, दिखा अलग अंदाज, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे सबंधी व्यवस्था का जायजा लेने पहुंचे थे मुख्यमंत्री

क्या है संविधान का अनुच्छेद 342?  
केंद्र सरकार से आदिवासी नेता संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन करने की मांग कर रहे हैं. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 (article 342) राष्ट्रपति को राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के बाद उस विशिष्ट राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में अनुसूचित जनजाति (एसटी) माने जाने वाली जनजातियों या आदिवासी समुदायों को अधिसूचित करने का अधिकार देता है.