क्लाइमेट चेंज की मार से कांपे चाय बागान, असम में चाय उत्पादन पर मंडराया संकट

नईदिल्ली 

असम के चाय बागानों में धूप की तपिश में काम करने वाली मजदूर कामिनी कुरमी सिर पर छाता बांध लेती हैं. इससे हाथ खाली रहते हैं. नाजुक पत्तियां तोड़ना आसान हो जाता है. लेकिन गर्मी इतनी तेज है कि सिर चकराने लगता है और दिल की धड़कन तेज हो जाती है. कामिनी जैसी सैकड़ों महिलाएं अपनी कुशल उंगलियों से चाय की फसल काटती हैं. मशीनें आम फसलों को जल्दी काट लेती हैं, लेकिन चाय के लिए हाथों की जरूरत पड़ती है. क्लाइमेट चेंज से मौसम की मार बढ़ रही है. इससे चाय की फसल सूख रही है. 

असम और दार्जिलिंग जैसी मशहूर चाय का भविष्य खतरे में है. दुनिया का चाय व्यापार सालाना 10 अरब डॉलर से ज्यादा का है. टी रिसर्च एसोसिएशन की वैज्ञानिक रूपंजली देब बरुआ कहती हैं कि तापमान और बारिश के पैटर्न में बदलाव अब कभी-कभी की बात नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति है. गर्मी और अनियमित बारिश से फसलें कम हो रही हैं. 

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भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चाय उत्पादक देश है. लेकिन घरेलू खपत बढ़ने से निर्यात घट रहा है. पिछले साल उत्पादन 7.8% गिरकर 1.3 अरब किलोग्राम रह गया. खासकर असम में भारी नुकसान हुआ. इससे कीमतें 20% बढ़ गईं. औसतन 201.28 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई. 30 साल में चाय की कीमतें सालाना सिर्फ 4.8% बढ़ीं, जबकि गेहूं-चावल की 10%. 40 साल से चाय बागान में काम करने वाली मंजू कुरमी कहती हैं कि पहले 110 किलोग्राम पत्तियां तोड़ लेती थीं. लेकिन अब गर्मी बढ़ने से सिर्फ 60 किलोग्राम ही संभव है. गर्मी से मजदूर थक जाते हैं. 

फैक्ट्रियों में पत्तियां सुखाने के दौरान हर 30 मिनट में ब्रेक लेना पड़ता है. पुतली लोहार, जो 12 साल से फैक्ट्री में काम कर रही हैं, कहती हैं कि हम दीवार पर लगे पंखों के नीचे ठंडक लेते हैं. फैक्ट्री में सूखी पत्तियों को बड़े ड्रम में कुचला जाता है. फिर महिलाएं कैप, मास्क और एप्रन पहनकर चेक करती हैं. असम की चाय का सबसे अच्छा हिस्सा दूसरी फ्लश है, जो खुशबू और स्वाद के लिए मशहूर है. लेकिन गर्म लहरें इसे सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं. गर्मी और नमी जरूरी है, लेकिन लंबे सूखे और अचानक भारी बारिश बर्बाद कर देती हैं. 

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टिनसुकिया जिले के 82 साल पुराने बागान के मालिक मृतुनजय जालान कहते हैं कि ऐसे मौसम से कीट बढ़ते हैं. हमें सिंचाई करनी पड़ती है, जो पहले कम इस्तेमाल होती थी. टी रिसर्च के मुताबिक 1921 से 2024 तक बारिश 250 मिमी कम हुई. न्यूनतम तापमान 1.2 डिग्री बढ़ा.

इस मॉनसून में बारिश औसत से 38% कम रही. कीटों से पत्तियां भूरी हो जाती हैं, छेद हो जाते हैं. इससे फसल का समय छोटा हो गया. वरिष्ठ चाय उत्पादक प्रभात बेजबोरुआ कहते हैं कि चाय की कीमतें अब अस्थिर हैं. इस साल सुधार हो रहा, लेकिन अगले साल कम उत्पादन से कीमतें बढ़ेंगी. चाय उद्योग पहले से कर्ज में डूबा है. लागत सालाना 8-9% बढ़ रही – मजदूरी और खाद महंगी. इंडियन टी एसोसिएशन के चेयरमैन हेमंत बंगुर कहते हैं कि पिछले साल सूखे से फसल घटी, तो पेड़ काटे, खाद गड्ढे बनाए और कीटनाशक इस्तेमाल बढ़ाया. इससे खर्च और बढ़ा. 

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असम में औपनिवेशिक काल के कई पेड़ 40-50 साल पुराने हो चुके. वे कम फलते हैं. मौसम सहन नहीं कर पाते. नए पौधे लगाने के लिए सरकारी मदद कम है. पिछले दशक में घरेलू खपत 23% बढ़कर 1.2 अरब किलोग्राम हो गई. उत्पादन सिर्फ 6.3% बढ़ा. 2024 में भारत का वैश्विक व्यापार हिस्सा 12% था. 
निर्यात घट रहा, आयात दोगुना होकर 45.3 मिलियन किलोग्राम पहुंचा. कोलकाता के एक निर्यातक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि भारत में कमी से वैश्विक सप्लाई टाइट हो सकती है. कीमतें बढ़ेंगी. केन्या और श्रीलंका में भी उत्पादन कम हो रहा.