ईरान युद्ध में टॉरपीडो की एंट्री, जिसे अमेरिका ने आखिरी बार दूसरे विश्व युद्ध में इस्तेमाल किया था

विदेश 

ईरान-अमेरिका के युद्ध में मिसाइलों के बाद अब टॉरपीडो की एंट्री भी हो गई है. अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने दावा किया है कि हिंद महासागर में ईरान का एक युद्धपोत अमेरिका ने टॉरपीडो से हमला करके डुबो दिया है.अमेरिकी रक्षा मंत्री ने कहा है कि हिंद महासागर में अमेरिका ने एक ईरानी युद्धपोत को डुबो दिया, जिसे लगा कि वह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में सुरक्षित है. कई सालों बाद टॉरपीडो का इस्तेमाल होने से इसकी काफी चर्चा हो रही है.

ऐसे में जानते हैं कि आखिर ये होता क्या है और कैसे इससे नुकसान पहुंचाया जाता है… साथ ही जानते हैं कि क्या भारत के पास भी ये हथियार हैं…

वर्ल्ड वॉर में हुआ था इस्तेमाल

क्या आप जानते हैं दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद टॉरपीडो से किसी जहाज को डुबोए जाने की यह चौथी घटना है. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यह पहली बार है जब अमेरिका ने किसी दुश्मन जहाज को टॉरपीडो से निशाना बनाया है. 

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है क्या टॉरपीडो?

टॉरपीडो एक ऑटोमैटिक हथियार है, जिसे पानी की सतह के ऊपर या नीचे से दागा जा सकता है और ये पानी के अंदर टारगेट को हिट करता है. ज्यादातर इसका इस्तेमाल पनडुब्बियों और जहाजों को टारगेट करने के लिए किया जाता है. इसमें एक विस्फोटक सामग्री होती है, जो टारगेट से टकराने पर या उसके पास पहुंचने पर फट जाती है.

हालांकि, टॉरपीडो का इस्तेमाल खासकर पनडुब्बियों में किया जाता है, लेकिन इन्हें सतह पर मौजूद युद्धपोतों से भी दागा जा सकता है या विमानों द्वारा गिराया जा सकता है. आधुनिक टॉरपीडो को आमतौर हल्के या भारी टॉरपीडो में बांट दिया गया है, जिससे कई  तरह के टारगेट को हिट करने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है. इसे 1960 के दशक में दुश्मन की पनडुब्बियों और सतह के हथियारों दोनों के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए डिजाइन किया गया था. 

इसे सबसे पहली बार 19वीं शताब्दी में ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य में बनाया गया था, जिसके बाद धीरे-धीरे इनका उपयोग विश्वभर की नेवी में फैल गया. शुरुआत में इन्हें छोटे, तीव्र गति वाले जहाजों पर लगाया जाता था, जिनका उद्देश्य उस समय के बड़े, भारी कवच ​​वाले, लेकिन धीमी गति वाले युद्धपोतों और ड्रेडनॉट्स को चुनौती देना था. 

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पहले और दूसरे विश्व युद्ध में हुआ था इस्तेमाल

टॉरपीडो का पहला बड़े पैमाने पर उपयोग प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुआ, जब जर्मन पनडुब्बियों (जिन्हें यू-बोट के नाम से जाना जाता था) ने ब्रिटिश द्वीपों की ओर जाने वाले अटलांटिक महासागर में व्यापारिक जहाजों पर हमला करने के लिए इनका इस्तेमाल किया. हालांकि, टॉरपीडो युद्ध अपने चरम पर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पहुंचा, जब सभी प्रमुख शक्तियों ने अपने सतही जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों को टॉरपीडो से लैस कर दिया. उस वक्त कई टॉरपीडो का इस्तेमाल किया गया था.

क्या भारत के पास भी है..

अमेरिका के मार्क 48, चीन के यू-6, इटली के ब्लैक शार्क, रूस के टाइप 53 टॉरपीडो को दुनिया भर की नेवी में सबसे अहम हथियार माना जाता है. इसमें भारत का वरुणस्त्र आदि भी शामिल हैं. वरुणस्त्र को डीआरडीओ की ओर से एंटी-एयरक्राफ्ट गन (एएसडब्ल्यू) के लिए डिज़ाइन किया गया था, जो एक स्वदेशी हथियार है.

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वरुणस्त्र का उपयोग भारतीय नौसेना के कई जहाजों में किया जाता है. भारतीय नेवी की पनडुब्बियां सोवियत-युग के टाइप 53 टॉरपीडो का उपयोग करती हैं, जबकि स्कॉर्पीन श्रेणी की पनडुब्बियां फ्रांसीसी F21 और इतालवी ब्लैक शार्क हैवीवेट टॉरपीडो के मिश्रण का उपयोग करती हैं.

वहीं, नौसेना के P-8 पोसाइडन और MH-60R सीहॉक एएसडब्ल्यू विमान, अमेरिका से प्राप्त एयर-ड्रॉप किए जाने वाले मार्क 54 लाइटवेट टॉरपीडो का उपयोग करते हैं. भारतीय नौसेना की ओर से इस्तेमाल किया जाने वाला सबसे शक्तिशाली टॉरपीडो सुपरसोनिक मिसाइल-असिस्टेड रिलीज ऑफ टॉरपीडो या स्मार्ट सिस्टम है. ये 643 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्यों को भेद सकता है.