छत्तीसगढ़ में हो सकता है टिड्डों का हमला, किसान देखें इससे बचने के उपाय 

Johar36garh (Web Desk)| देश के कई राज्यों में फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने वाले टिड्डी दल का आक्रमण छतीसगढ़ प्रदेश में भी हो सकता है। कृषि व किसान कल्याण मंत्रालय भारत सरकार के केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन केंद्र ने छत्तीसगढ़ राज्य को पहले से ही सतर्क कर दिया है। संचालक कृषि को सूचना देकर टिड्डी दल के आक्रमण से बचने के लिए आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता जताई गई है।

यदि छत्तीसगढ़ में टिड्डी दल का आक्रमण हुआ तो वर्तमान सीजन की फसल पूरी तरह से नष्ट होने की संभावना है। टिड्डी दल द्वारा राजस्थान, गुजरात में बड़े रकबे की खेती को चौपट कर किसानों को तगड़ा झटका दिया गया है। कोरोना संकट की घड़ी में टिड्डी दल से निपटना भी बड़ी चुनौती बनकर भविष्य में सामने आ सकती है।

भारत सरकार के कृषि और किसान मंत्रालय से सम्बद्ध केंद्रीय एकीकृत नाशीजीव प्रबन्धन केंद्र की एक चिट्ठी ने कृषि विभाग के अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। यह चिठ्ठी टिड्डी दल के छतीसगढ़ में संभावित आक्रमण को लेकर लिखी गई है। अवगत कराया गया है कि राजस्थान से होते हुए टिड्डी दल मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र तक पहुंच चुका है।

छतीसगढ़ की सीमाएं दोनों राज्यों से लगी हुई है, इसलिए भविष्य में टिड्डी दल दोनों राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों से होते हुए छत्तीसगढ़ में प्रवेश कर सकता है। इससे बचाव के लिए जानकारी भी प्रेषित की गई है। कीटनाशकों के समय पूर्व उपयोग से टिड्डी दल के आक्रमण से बचा जा सकता है। उत्तरप्रदेश में भी इसका प्रकोप है, लेकिन छत्तीसगढ़ की सीमा से जुड़े उत्तरप्रदेश के जिलों तक यह नहीं पहुंचा है।

See also  सिम्स की सुरक्षा के लिए लगाए गए 94 सीसी टीवी कैमरे बने सिरदर्द, अक्सर मिलते है बंद

यह फसल एक माह के भीतर पक जाएगी। सब्जीवर्गीय फसलों का भरपूर उत्पादन संभाग के जिलों में हो रहा है ऐसे समय में टिड्डी दल को लेकर सामने आई जानकारी चिंता का विषय है। बताया जा रहा है कि आंधी तूफान चलने पर टिड्डियों का दल एक दिन में लम्बी उड़ान भर लेते हैं। टिड्डियों का बड़ा दल कम समय मे ही बड़े रकबे की फसल को चौपट कर देता है।

कृषि वैज्ञानिक (सस्यविज्ञान) चंद्रशेखर खरे ने बताया की किसान भाई टिड्डी दल से बचने के लिए कई उपाय अपना सकते हैं| फसल के अलावा, टिड्डी कीट जहां इकट्ठा हो, वहां उसे फ्लेमथ्रोअर से जला दें। टिड्डी दल को भगाने के लिए थालियां, ढोल, नगाड़़े, लाउटस्पीकर या दूसरी चीजों के माध्यम से शोरगुल मचाएं। जिससे वे आवाज़ सुनकर खेत से भाग जाएं, और अपने इरादों में कामयाब ना हो पाएं।


उन्होंने बताया की टिड्डों ने जिस स्थान पर अपने अंडे दिये हों, वहां 25 कि.ग्रा या 5 प्रतिशत मेलाथियोन या 1.5 प्रतिशत क्विनालफॉस को मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़कें।टिड्डी दल को आगे बढ़ने से रोकने के लिए 100 कि.ग्रा धान की भूसी को 0.5 कि.ग्रा फेनीट्रोथीयोन और 5 कि.ग्रा गुड़ के साथ मिलाकर खेत में डाल दें। इसके जहर से वे मर जाते हैं। टिड्डी दल के खेत की फसल पर बैठने पर, उस पर 5 प्रतिशत मेलाथीयोन या 1.5 प्रतिशत क्विनाल्फोस का छिड़काव करें।  50 प्रतिशत ई.सी फेनीट्रोथीयोन या मेलाथियोन अथवा 20 प्रतिशत ई.सी. क्लोरपाइरिफोस 1 लीटर दवा को 800 से 1000 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में छिड़काव करें, टिड्डी दल सवेरे 10 बजे के बाद ही अपना डेरा बदलता है। इसलिए, इसे आगे बढ़ने से रोकने के लिए 5 प्रतिशत मेलाथियोन या 1.5 प्रतिशत क्विनालफॉस का छिड़काव करें। 500 ग्राम या 40 मिली नीम के तेल को 10 ग्राम कपड़े धोने के पाउडर के साथ, या फिर 20 -40 मिली नीम से तैयार कीटनाशक को 10 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करने से टिड्डे फसलों को नहीं खा पाते। फसल कट जाने के बाद खेत की गहरी जुताई करें। इससे इनके अंडे नष्ट हो जाते हैं।

See also  छत्तीसगढ़-रायपुर में चल रही ’’जैविक कृषक खेत पाठशाला’’, किसान सीख रहे जैविक खेती के वैज्ञानिक तरीके

कृषि वैज्ञानिक के अनुसार टिड्डी किट का वैज्ञानिक नाम स्चहिस्तोसेरका ग्रेगरिया (Schistocerca gregaria) टिड्डी ऐक्रिडाइइडी परिवार के ऑर्थाप्टेरा गण का कीट है। हेमिप्टेरा गण के सिकेडा वंश का कीट भी टिड्डी या फसल डिड्डी (Harvest Locust) कहलाता है। इसे लधुश्रृंगीय टिड्डा (Short Horned Grasshopper) भी कहते हैं। संपूर्ण संसार में इसकी केवल छह जातियाँ पाई जाती हैं। यह प्रवासी कीट है और इसकी उड़ान दो हजार मील तक पाई गई है। टि़ड्डियों को उनके चमकीले पीले रंग और पिछले लंबे पैरों से उन्हें पहचाना जा सकता है। टिड्डी जब अकेली होती है तो उतनी खतरनाक नहीं होती है। लेकिन, झुंड में रहने पर इनका रवैया बेहद आक्रामक हो जाता है। फ़सलों को एक बारगी सफ़ाया कर देती हैं। आपको दूर से ऐसा लगेगा, मानो आपकी फ़सलों के ऊपर किसी ने एक बड़ी-सी चादर बिछा दी हो। कुछ समय पहले अफ़्रीकी देशों में इन्होंने फ़सलों को काफी नुकसान पहुंचाया हैं।

-मादा टिड्डी मिट्टी में कोष्ठ (cells) बनाकर, प्रत्येक कोष्ठ में 20 से लेकर 100 अंडे तक रखती है। अंडे जाड़े भर प्रसुप्त रहते हैं। गरम जलवायु में 10 से लेकर 20 दिन तक में अंडे फूट जाते हैं, शिशु टिड्डी के पंख नहीं होते तथा अन्य बातों में यह वयस्क टिड्डी के समान होती है। शिशु टिड्डी का भोजन वनस्पति है और ये पाँच छह सप्ताह में वयस्क हो जाती है। इस अवधि में चार से छह बार तक इसकी त्वचा बदलती है। वयस्क टिड्डियों में 10 से लेकर 30 दिनों तक में प्रौढ़ता आ जाती है और तब वे अंडे देती हैं।

See also  पामगढ़ में गुरुपर्व पर युवाओं द्वारा प्रसाद का वितरण

टि़ड्डियां फूल, फल, पत्ते, बीज, पेड़ की छाल और अंकुर सबुकछ खा जाती हैं। हर एक टिड्डी अपने वजन के बराबर खाना खाती है। इस तरह से एक टिड्डी दल, 2500 से 3000 लोगों का भोजन चट कर जाता है। टिड्डियों का जीवन काल अमूमन 40 से 85 दिनों का होता है।