Airtel की ‘Fast Lane’ सर्विस क्या है? रीब्रांड के बाद फिर छिड़ी नेट न्यूट्रैलिटी की बहस

भारतीय टेलीकॉम सेक्टर में एक बार फिर बहस छिड़ गई है. एयरटेल ने अपने ‘Priority Postpaid’ प्लान को रीब्रांड करके अब ‘Fast Lane’ नाम दे दिया है. नाम बदलने के साथ ही यह सर्विस फिर चर्चा में आ गई है, क्योंकि इसे लेकर पहले ही यूजर्स में काफी नाराजगी देखी गई थी.

दरअसल Airtel ने कुछ समय पहले ‘Priority’ नाम से एक पोस्टपेड सर्विस शुरू की थी. कंपनी का दावा था कि इस प्लान में पोस्टपेड यूजर्स को भीड़-भाड़ वाले इलाकों में प्रीपेड यूजर्स के मुकाबले ज्यादा स्पीड मिलेगी और बेहतर नेटवर्क एक्सपीरियंस मिलेगा.

हालांकि, जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो गई कि क्या अब बेहतर नेटवर्क स्पीड पाने के लिए अलग से पैसे देने पड़ेंगे?

अब कंपनी ने उसी सर्विस को नए नाम ‘Fast Lane’ के साथ पेश किया है. Airtel ने सिर्फ नाम बदला है, जबकि प्लान और इसकी सुविधाएं लगभग पहले जैसी ही हैं. कंपनी इसे एक प्रीमियम एक्सपीरियंस के तौर पर पेश कर रही है.

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कंपनी के मुताबिक नया पोस्टपेड प्लान रीब्रांड कर दिया गया है. दरअसल कंपनी नेटवर्क स्लाइसिंग टेक्नोलॉजी का यूज करके बेहतर 5G एक्सपीरिएंस देने की बात कह रही है. एयरटेल के मुताबिक फास्ट लेन नाम इस प्लान के हिसाब से सही है, इसलिए प्रायॉरिटी प्लान की जगह ये नया नाम दिया गया है.

Fast Lane है क्या?
आसान भाषा में समझें तो यह एक ऐसी सर्विस है जिसमें कुछ यूजर्स को नेटवर्क पर प्रायॉरिटी दी जाती है. यानी जब नेटवर्क पर ज्यादा भीड़ होती है, तब Fast Lane वाले यूजर्स को बेहतर स्पीड और कम लेटेंसी मिल सकती है. यही वजह है कि इसे लेकर नेट न्यूट्रैलिटी की बहस फिर शुरू हो गई है.

नेट न्यूट्रैलिटी का मतलब होता है कि सभी यूजर्स को इंटरनेट पर बराबर का एक्सेस मिले. लेकिन अगर कुछ यूजर्स को पैसे देकर ‘फास्ट लेन’ मिलती है, तो बाकी यूजर्स के लिए अनुभव खराब हो सकता है. कंपनी का स्टैंड है कि इस तरह की सर्विस से नेट न्यूट्रैलिटी के साथ कोई खिलवाड़ नहीं हो रहा है. दूसरी कंपनियों ने भी कहा है कि नेटवर्क स्लाइसिंग पहले से यूज होता आया है.

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कंपनी का कहना है कि यह सर्विस नेटवर्क स्लाइसिंग टेक्नोलॉजी पर बेस्ड है, जो 5G के साथ आती है. इसका मतलब यह है कि नेटवर्क को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर अलग-अलग यूजर्स को अलग अनुभव दिया जा सकता है.

कंपनी यह भी दावा करती है कि इससे बाकी यूजर्स पर कोई नेगेटिव असर नहीं पड़ेगा. यानी फास्ट लेन लेने वालों को फायदा मिलेगा, लेकिन बाकी लोगों की स्पीड कम नहीं होगी. लेकिन टेक एक्सपर्ट्स इस दावे को पूरी तरह से मानने के लिए तैयार नहीं हैं.

उनका कहना है कि अगर नेटवर्क लिमिटेड है और कुछ यूजर्स को प्राथमिकता दी जाती है, तो इसका असर बाकी यूजर्स पर जरूर पड़ेगा, खासकर भीड़ वाले इलाकों में.

कुछ यूजर्स का कहना है कि यह टेलीकॉम इंडस्ट्री में एक खतरनाक शुरुआत हो सकती है, जहां फ्यूचर में हर बेहतर सर्विस के लिए अलग से पैसे देने पड़ेंगे. वहीं कुछ लोग इसे प्रीमियम सर्विस मानते हैं, जैसे एयरपोर्ट पर फास्ट ट्रैक या टोल पर फास्टैग. यानी जो ज्यादा पैसे देगा, उसे बेहतर और तेज अनुभव मिलेगा..

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अगर यह मॉडल सफल होता है, तो आने वाले समय में बाकी टेलीकॉम कंपनियां भी इसी रास्ते पर चल सकती हैं. इसका मतलब यह होगा कि इंटरनेट का अनुभव अब पूरी तरह समान नहीं रहेगा. फिलहाल Airtel ने साफ किया है कि प्लान्स में कोई बदलाव नहीं किया गया है, सिर्फ ब्रांडिंग बदली गई है.