कान्हा नेशनल पार्क में आएंगे असम के वाइल्ड बफेलो, टाइगर रिजर्व में बढ़ेगा वाइल्डलाइफ रोमांच

मंडला 
 टाइगर्स के लिए विश्वप्रसिद्ध कान्हा नेशनल पार्क में नए मेहमान आने वाले हैं. लेकिन इन मेहमानों को हल्के में न लें, ये हैं भारी भरकम आसामी जंगली भैैंसे. जल्द ही असम से मध्य प्रदेश के इस टाइगर रिजर्व में जंगली भैसों की एंट्री होने वाली है, जिसके बाद जंगल का रोमांच और बढ़ने जा रहा है. दुनिया भर के पर्यटक यहां प्रकृति की सुंदरता और बाघ सहित अन्य वन्य प्राणियों के दीदार के लिए पहुचते हैं, वहीं अब भैसों की तादाद भी यहां बढ़ाई जा रही है.

कान्हा में अचानक घटी जंगली भैसों की तादाद

कान्हा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक रविंद्र मणि त्रिपाठी के अनुसार, '' यहां पहले जंगली भैंसों की उपस्थिति थी, लेकिन समय के साथ उनकी संख्या बहुत कम हो गई. किसी भी प्रजाति की अचानक कमी जंगल पर प्रतिकूल असर डालती है. यही कारण है कि अब असम के राष्ट्रीय उद्यानों से जंगली भैंसों को कान्हा में बसाने की योजना बनाई जा रही है.''

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असम से जंगली भैंसे लाने की रूपरेखा तैयार

वन विभाग के मुताबिक सुपखार क्षेत्र को जंगली भैंसों के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है. असम से जंगली भैसों को 5 चरणों में कान्हा लाने की तैयारी चल रही है. उच्चाधिकारियों के साथ लगातार परामर्श जारी है और जल्द ही इस दिशा में कदम उठाए जाने की उम्मीद है. इस पहल से न सिर्फ वन्यजीवन को मजबूती मिलेगी बल्कि पर्यटकों के लिए भी कान्हा नेशनल पार्क का अनुभव और समृद्ध होगा.

पांच चरणों में होगा ट्रांसलोकेशन

योजना के अनुसार, जंगली भैंसों को असम से लाने का काम पांच चरणों में पूरा किया जाएगा. पार्क के सुपखार क्षेत्र को इनके लिए सबसे उपयुक्त चिन्हित किया गया हैृ. इस महत्वपूर्ण परियोजना पर उच्च स्तर पर चर्चा जारी है और जल्द ही इसे अमली जामा पहनाने की उम्मीद है. इस पहल से न सिर्फ पार्क के वन्यजीवन को मजबूती मिलेगी, बल्कि पर्यटकों को भी एक नए और दुर्लभ वन्यजीव को देखने का अवसर मिल सकेगा.

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कान्हा में बसेंगे आसामी भैंसे

कान्हा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक रविंद्र मणि त्रिपाठी ने बताया, '' कान्हा में कभी जंगली भैंसों की अपनी आबादी हुआ करती थी और कान्हा नेशनल पार्क से इन्हें बाहर भी भेजा गया था लेकिन समय के साथ ये प्रजाति लगभग विलुप्त हो गई. किसी भी प्रजाति की अनुपस्थिति पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव डालती है. इसी कमी को दूर करने और जैव विविधता को बढ़ाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है.