पोलियो से जंग, पैरालंपिक में पदक तक का सफर: वरुण सिंह भाटी की प्रेरक कहानी

नई दिल्ली
वरुण सिंह भाटी का नाम देश के श्रेष्ठ पैरा एथलीटों में लिया जाता है। वह ऊंची कूद में देश को पैरालंपिक में पदक दिला चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली इस सफलता का सफर वरुण के लिए आसान नहीं था, लेकिन अपनी मुश्किलों को पीछे छोड़ते हुए और कड़ी मेहनत के बल पर उन्होंने अपना रास्ता बनाया है।

वरुण सिंह भाटी का जन्म 13 फरवरी 1995 को नोएडा में हुआ था। महज छह महीने की उम्र में पोलियोमाइलाइटिस का शिकार होने के बाद उनके एक पैर में स्थायी विकलांगता आ गई। गलत दवा की वजह से उनकी परेशानी और बढ़ गई। बचपन में शारीरिक रूप से मिले इस झटके के बावजूद वरुण के परिवार ने उन्हें कभी कमजोर और हतोत्साहित नहीं होने दिया और हमेशा उन्हें कुछ बड़ा करने के लिए प्रेरित किया।

बचपन से ही वरुण को खेलों में रुचि थी। बास्केटबॉल उनका पसंदीदा खेल था, लेकिन बाद में उन्होंने ऊंची कूद में बेहतर करने का लक्ष्य बनाया। उन्होंने सामान्य एथलीटों के साथ अभ्यास करना शुरू किया ताकि उन्हें बेहतर करने की प्रेरणा मिल सके। पूर्व राष्ट्रीय एथलीट सत्यनारायण की कोचिंग में उनके करियर को नई उड़ान मिली। गोस्पोर्ट्स फाउंडेशन के पैरा चैंपियंस प्रोग्राम से मिले समर्थन ने भी उनके सफर को मजबूती दी।

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टी42 श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करने वाले वरुण ने 2012 में 1.60 मीटर की छलांग के साथ लंदन पैरालिंपिक के लिए ‘ए’ क्वालिफिकेशन मार्क हासिल किया था, हालांकि सीमित स्लॉट के कारण वे उस संस्करण में हिस्सा नहीं ले सके। इसके बाद उन्होंने 2014 एशियन पैरा गेम्स में भाग लिया और उसी साल चाइना ओपन में स्वर्ण पदक जीता।

2016 उनके करियर के लिए शानदार था। आईपीसी एशिया-ओशिनिया चैंपियनशिप में 1.82 मीटर की छलांग लगाकर उन्होंने स्वर्ण और एशियन रिकॉर्ड अपने नाम किया। रियो पैरालिंपिक 2016 में 1.86 मीटर की व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ छलांग के साथ उन्होंने कांस्य पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया। 2017 विश्व पैरा एथलेटिक्स चैंपियनशिप में भी उन्होंने कांस्य पदक जीता। 2018 एशियन पैरा गेम्स में 1.82 मीटर के साथ रजत पदक हासिल किया। उनके बेहतरीन खेल और सफलता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 29 अगस्त 2018 को अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया था।

 

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