AMCA प्रोजेक्ट से भारत की बड़ी उड़ान, 100 कंपनियां बनेंगी भागीदार; F-35 जैसी क्षमता की तैयारी?

बेंगलुरु 

भारत का एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) सिर्फ एक नया लड़ाकू विमान नहीं है. इसे भारत के रक्षा उद्योग के लिए उस बुनियादी बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है, जो आने वाले एक-दो दशकों में देश को पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट बनाने में आत्मनिर्भर बना सकता है. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक आगे बढ़ता है तो भविष्य में भारत अपेक्षाकृत कम लागत पर अमेरिका के F-35 जैसी श्रेणी के आधुनिक लड़ाकू विमान विकसित और निर्मित करने की भी क्षमता हासिल कर सकता है। 

हालांकि, यह लक्ष्य रातोंरात हासिल नहीं होगा. विशेषज्ञों का मानना है कि AMCA का असली परिणाम अगले कुछ वर्षों में नहीं, बल्कि अगले 10 से 20 वर्षों में दिखाई देगा. लेकिन जिस औद्योगिक ढांचे की नींव आज रखी जा रही है, वही भारत के भविष्य के सैन्य विमानन उद्योग की सबसे बड़ी ताकत बनेगी। 

सिर्फ फाइटर जेट नहीं, पूरा इकोसिस्टम तैयार हो रहा
अब तक भारत के अधिकांश लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में सरकारी कंपनियों की भूमिका सबसे प्रमुख रही है. लेकिन AMCA इस मॉडल को बदल रहा है. रक्षा मंत्रालय ने पहली बार निजी क्षेत्र के कंसोर्टियम को फ्रंटलाइन फाइटर जेट के प्रोटोटाइप निर्माण के लिए रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (RFP) जारी किया है. यानी सरकार अब सिर्फ विमान नहीं बनाना चाहती, बल्कि उसके पीछे ऐसा औद्योगिक नेटवर्क खड़ा करना चाहती है जिसमें 100 से अधिक भारतीय कंपनियां अलग-अलग तकनीकों पर काम करें. यही मॉडल अमेरिका और यूरोप के रक्षा उद्योगों की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। 

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क्यों महत्वपूर्ण हैं 100 कंपनियां?
किसी 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ विमान का निर्माण केवल एयरफ्रेम बनाने तक सीमित नहीं होता. इसमें हजारों अलग-अलग पुर्जे, सॉफ्टवेयर, सेंसर, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम, इंजन, कंपोजिट मटेरियल और मिशन कंप्यूटर शामिल होते हैं. AMCA परियोजना में बड़ी कंपनियों के साथ-साथ टियर-1, टियर-2 और टियर-3 सप्लायरों का विशाल नेटवर्क तैयार किया जा रहा है। 

एयरफ्रेम और कंपोजिट स्ट्रक्चर के लिए टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, एलएंडटी, डायनामेटिक टेक्नोलॉजीज, काइनेको एयरोस्पेस और टाटा एडवांस्ड मैटेरियल्स जैसी कंपनियां अहम भूमिका निभा सकती हैं. रडार, सेंसर और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के क्षेत्र में एलआरडीई, एस्ट्रा माइक्रोवेव, डेटा पैटर्न्स और अल्फा डिजाइन टेक्नोलॉजीज जैसी संस्थाएं योगदान देंगी. वहीं इंजन सपोर्ट इकोसिस्टम विकसित करने में गोदरेज एयरोस्पेस, एमटीएआर टेक्नोलॉजीज और वालचंदनगर इंडस्ट्रीज जैसी कंपनियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। 

F-35 जैसी क्षमता का रास्ता

दुनिया में पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाना बेहद जटिल और महंगा काम माना जाता है. अमेरिका का F-35 कार्यक्रम इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. इस परियोजना में हजारों कंपनियां और दशकों का अनुसंधान शामिल रहा है. भारत फिलहाल उसी स्तर पर नहीं है, लेकिन AMCA के जरिए वह उसी दिशा में बुनियादी क्षमता विकसित कर रहा है। 

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स्टील्थ डिजाइन, इंटरनल वेपन बे, सेंसर फ्यूजन, एडवांस्ड मिशन कंप्यूटर, नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर और एआई आधारित प्रणालियां- ये सभी तकनीकें AMCA का हिस्सा होंगी. एक बार भारतीय उद्योग इन तकनीकों में दक्ष हो गया तो भविष्य के और अधिक उन्नत विमानों का विकास अपेक्षाकृत कम लागत और कम विदेशी निर्भरता के साथ किया जा सकेगा. यही वजह है कि कई रक्षा विशेषज्ञ AMCA को केवल एक विमान नहीं, बल्कि भारत का फ्यूचर एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म मान रहे हैं। 

इंजन अभी विदेशी, लेकिन लक्ष्य आत्मनिर्भरता
AMCA के शुरुआती प्रोटोटाइप में अमेरिका के GE-F414 इंजन लगाए जाएंगे. इस संबंध में सह-उत्पादन और तकनीकी सहयोग पर बातचीत भी आगे बढ़ चुकी है. हालांकि, भारत का अंतिम लक्ष्य केवल विदेशी इंजन पर निर्भर रहना नहीं है. समानांतर रूप से स्वदेशी इंजन तकनीक विकसित करने और इंजन निर्माण की घरेलू क्षमता बढ़ाने पर भी काम जारी है. यानी शुरुआत विदेशी तकनीक से होगी, लेकिन मंजिल पूरी तरह स्वदेशी क्षमता हासिल करना है। 

परिणाम आने में क्यों लगेगा समय?
रक्षा परियोजनाओं में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक का विकास और परीक्षण होता है. सरकार की योजना के अनुसार निजी भागीदार के चयन के बाद पांच उड़ान योग्य प्रोटोटाइप तैयार किए जाएंगे. लक्ष्य है कि पहला प्रोटोटाइप 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक तैयार हो और पहली उड़ान 2028 में हो. इसके बाद व्यापक परीक्षण, हथियारों का एकीकरण, स्टील्थ सत्यापन और विभिन्न परिस्थितियों में उड़ान परीक्षण होंगे. यही वजह है कि वास्तविक परिचालन क्षमता हासिल करने में कई वर्ष लग सकते हैं. लेकिन, रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे कार्यक्रमों में सबसे बड़ी उपलब्धि अंतिम विमान नहीं, बल्कि उसके निर्माण के दौरान विकसित होने वाला औद्योगिक और तकनीकी आधार होता है। 

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आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग की सबसे बड़ी परीक्षा
AMCA देश की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ रणनीति की सबसे कठिन परीक्षा भी होगी. यदि यह कार्यक्रम सफल रहता है तो भारत केवल अपनी वायुसेना की जरूरतें पूरी नहीं करेगा, बल्कि भविष्य में वैश्विक रक्षा आपूर्ति श्रृंखला में भी बड़ी भूमिका निभा सकता है. इससे देश में उच्च तकनीक विनिर्माण, अनुसंधान, रोजगार और निर्यात के नए अवसर पैदा होंगे.आज जिन 100 से अधिक कंपनियों को इस कार्यक्रम का हिस्सा बनाया जा रहा है, वही आने वाले वर्षों में भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता की रीढ़ बन सकती हैं. इसलिए AMCA को केवल एक विमान परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि उस नींव के रूप में देखा जाना चाहिए।