विपक्ष के ‘फर्जी नैरेटिव’ की राजनीति… यूपी में किसे मिल रहा फायदा?

लखनऊ 
किसी भी लोकतंत्र में एक सशक्त और जागरूक विपक्ष की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी कि सरकार की। विपक्ष का काम नकारात्मकता की राजनीति से बचते हुए सरकार की नीतियों की समीक्षा करना और जनता के मुद्दों को उठाना है। लेकिन वर्तमान में उत्तर प्रदेश की राजनीति का अवलोकन करें, तो एक बिल्कुल अलग तस्वीर नज़र आती है। यहां विकास की ठोस जमीन पर असंतोष के अंकुर तलाशने में नाकाम विपक्ष मुद्दों के अभाव में उस रास्ते पर बढ़ चला है, जहां खुद उसकी विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लग रहे हैं। यह रास्ता है- सरकार को लेकर फर्जी नैरेटिव गढ़ने का।

दरअसल, गुजरे साढ़े नौ सालों में विकास, कृषि, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, महिला सशक्तीकरण, निवेश, औद्योगिकीकरण, कनेक्टिविटी आदि के साथ ही जन सुविधाओं के मामले में उत्तर प्रदेश में वह सबकुछ हुआ है, जो पिछली सरकारें नहीं कर सकीं। ऐसे में विपक्ष की सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में वह किन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाए। यही अनिश्चितता व अनिर्णय की स्थिति उसे एक खतरनाक खेल की तरफ ले जा रही है। विकास की वास्तविक बहस से ध्यान भटकाने के लिए सुनियोजित तरीके से "फर्जी नैरेटिव" गढ़े जा रहे हैं।

ठोस धरातल बनाम हवा-हवाई नैरेटिव
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश ने अपनी पहचान और छवि में ऐतिहासिक बदलाव देखा है। एक समय जो प्रदेश 'बीमारू' राज्यों की श्रेणी में गिना जाता था, वह आज एक्सप्रेसवे, नए एयरपोर्ट्स, मेट्रो नेटवर्क और औद्योगिक कॉरिडोर का पर्याय बन चुका है। सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर जो सुधार हुए हैं, उसने न केवल आम नागरिक को राहत दी है, बल्कि देश-विदेश के निवेशकों में एक नया विश्वास जगाया है। युवाओं व किसानों के चेहरों पर सालों बाद चमक लौटी है। जब सड़क, बिजली, कानून-व्यवस्था और निवेश जैसे प्राथमिक मुद्दों पर सरकार का प्रदर्शन स्पष्ट दिखाई दे रहा हो, तो विपक्ष के सामने एक वैचारिक और तथ्यात्मक संकट खड़ा हो जाता है। यही वजह है कि नीतियों पर तथ्यों के साथ प्रहार करने के बजाय सोशल मीडिया और रैलियों के ज़रिये भ्रामक नैरेटिव तैयार करने का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है।

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नैरेटिव गढ़ने के पीछे की रणनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल के दिनों में उभरे फर्जी नैरेटिव के तरीकों को समझें तो इनमें कुछ पैटर्न दिखाई देते हैं, जिसमें चुनिंदा घटनाओं का राजनीतिकरण प्रमुख है। किसी भी दुर्भाग्यपूर्ण या स्थानीय आपराधिक घटना को तुरंत एक बड़ा रूप देकर उसे राज्य की समग्र कानून-व्यवस्था की विफलता के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है, भले ही पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की हो। लखनऊ में प्रॉपर्टी डीलर संदीप सिंह की हत्या और मेरठ का ललिता हत्याकांड इसका ताजा उदाहरण है। विपक्ष ने इन दोनों घटनाओं को धरना-प्रदर्शन के जरिये मुद्दा बनाने का प्रयास किया, लेकिन तथ्यात्मक धरातल नहीं मिलने से नाकामी ही हाथ लगी।

इसी प्रकार अयोध्या धाम में श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी एक आपराधिक घटना है, जिसमें तत्परता से जांच करते हुए अभियुक्तों को जेल भेजा जा चुका है। लेकिन, विपक्ष ने खासतौर से सपा व कांग्रेस ने इसे ऐसे प्रचारित करने का प्रयास किया कि जैसे पूरे अयोध्या धाम व श्रीराम मंदिर में श्रद्धालुओं को ठगा जा रहा है और इसीलिए रामभक्त इस धार्मिक नगरी से दूरी बना रहे हैं। यह नैरेटिव न चलना था और न चला। उल्टा नुकसान यह हुआ कि दोनों ही दल अब प्रभु श्रीराम व जन्मभूमि आंदोलन पर उनकी भूमिका से जुड़े कठोर सवालों का सामना कर रहे हैं। 

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भय व भ्रम का माहौल बनाने का प्रयास
विपक्ष जनहित की योजनाओं, विकास परियोजनाओं या प्रशासनिक फैसलों को लेकर जनता के बीच यह भ्रम फैलाने का भी लगातार प्रयास कर रहा है कि इनसे किसी विशेष वर्ग या समाज का नुकसान हो रहा है। इसका प्रमुख माध्यम सोशल मीडिया पर तथ्यहीन आंकड़ों और भ्रामक खबरों का प्रसार है। मंशा यही कि बिना किसी सत्यापन या डेटा के भ्रामक दावे फैला दिए जाएं, जब तक सच सामने आएगा, राजनीतिक लाभ मिल चुका होगा। यह अलग बात है कि हालिया तमाम ऐसे प्रयास विपक्ष पर ही भारी पड़े हैं।

विकास का सामना नैरेटिव से क्यों?
दरअसल, जब विपक्ष के पास कोई वैकल्पिक 'विकास मॉडल' जनता के समक्ष पेश करने के लिए नहीं होता, तो वह पहचान, जाति और भ्रामक मुद्दों की राजनीति का सहारा लेता है। जनता जब यह पूछती है कि आपके पास रोजगार, बुनियादी ढांचे या सुशासन का क्या रोडमैप है, तो इस सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय भावनाओं को भड़काने वाले नैरेटिव सामने रख दिए जाते हैं। लेकिन, उत्तर प्रदेश का मतदाता आज पहले से कहीं अधिक जागरूक है। इंटरनेट और पारदर्शी प्रशासन के दौर में जनता यह भली-भांति समझती है कि कौन सा दावा ज़मीनी हकीकत से जुड़ा है और कौन सा महज़ राजनीतिक लाभ के लिए गढ़ा गया एक नैरेटिव।

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लोकतंत्र में राजनीतिक गतिशीलता तभी बनी रहती है, जब विपक्ष जनहित के वास्तविक मुद्दों पर सरकार को घेरे। फर्जी नैरेटिव गढ़कर भले ही कुछ समय के लिए राजनीतिक सुर्खियों में जगह बनाई जा सकती है, लेकिन यह रणनीति लंबे समय तक जनता का भरोसा जीतने में सक्षम नहीं हो सकती। उत्तर प्रदेश की जनता आज 'काम और परिणाम' की राजनीति को प्राथमिकता दे रही है, और इस माहौल में विपक्ष को भी नैरेटिव की राजनीति से निकलकर सकारात्मक व जन-केंद्रित राजनीति का रुख करना होगा।