साल 2026. जगह है राजधानी दिल्ली। महिलाएं सड़कों पर हैं। वजह है- “3 साल की बच्ची से लेकर 70 साल की बुजुर्ग महिला के साथ होने वाला अपराध। ये अपराध छेड़छाड़, प्रताड़ना से लेकर रेप-गैंगरेप और हत्या तक जाते हैं” ताजा मामला राजधानी दिल्ली के आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की के साथ गैंगरेप का है।
कुल मिलाकर असली मामला ‘महिला सुरक्षा’ से जुड़ा है, जो आजादी के करीब 80 साल बाद भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। अब महिलाएं अपनी सुरक्षा की मांग करते हुए सड़कों पर उतर गई हैं। नारेबाजी के साथ अपना हक मांगा जा रहा है। इन सबके बीच पुरुषों के एक खेमे से आवाज आई है- ‘हर मर्द एक नहीं होता।’ पुरुषों के ऐसा कहने की वजह है- महिला सुरक्षा की मांग में लगाए गए नारे।
आखिर किन नारों पर बहस शुरू हो गई है
- एक कचौड़ी दो समोसा, इन मर्दों का क्या भरोसा।
- एक सुट्टा दो चाय, मर्द जात हाय-हाय।
- शर्म नहीं मर्दों में, औरत क्यों है पर्दों में।
- नारी अपने आप की, नहीं किसी के बाप की।
- मेरे सर में दर्द है, इसका कारण मर्द है।
विरोध कर रहे पुरुषों का कहना है कि इन नारों में पुरुषों का सामान्यीकरण है। यानी कुछ पुरुषों के व्यवहार या महिलाओं के अनुभव को पूरे पुरुष वर्ग से जोड़ दिया गया है।
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इन नारों में ऐसा क्या है, जिससे नई बहस शुरू हो गई
“दिल्ली के दिल में प्रदर्शन कर रहीं लड़कियों द्वारा लगाए जा रहे नारों में कुछ इस तरह का सामान्यीकरण निकल रहा है। जैसे पूरे पुरुष वर्ग को एक जैसा बताया गया है। पुरुषों को स्वभाव से अविश्वसनीय बताने का सामान्यीकरण है। किसी समस्या का कारण सामान्य रूप से पुरुषों को बताना। “मर्द” को एक सामूहिक पहचान बनाकर उसके खिलाफ नकारात्मक धारणा बनाना।
नारों पर बहस करने वाले पुरुषों से सवाल
मगर मेरा सवाल नारों पर बहस कर रहे इन पुरुषों से भी है। लंबे समय से समाज में बोले जा रहे इन मुहावरों के बारे में आपका क्या ख्याल है?
- औरतों का भरोसा नहीं।
- जाओ जाकर चूड़ियां पहन लो।
- लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो।
- लड़कियों का दिमाग घुटनों में होता है।
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और फिर बताइए समाज में दी जा रहीं मां-बहन की गालियों में क्या होता है? वे उदाहरण तो ऐसे हैं कि मैं यहां लिख भी नहीं सकता। आम बोल-चाल के इतर साहित्य जगत भी इस तरह के मुहावरों से अछूता नहीं है।
- जोरू-जमीन जोर का नहीं तो किसी और का।
- ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।
- नारी की झांई पड़त, अंधा होत भुजंग। कबिरा तिन की कौन गति, जो नित नारी को संग।
- नारी मोहिनी रूप की, नर को करे गुलाम।
- अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आँचल में है दूध और आँखों में पानी।
नारों की बहस में दम तोड़ता असली मुद्दा
अगर अब आप यह वाक्य पढ़ रहे हैं, तो आपको धन्यवाद कि आपने यहां तक पढ़ा। मगर ध्यान कीजिए कि इन सब नारों-मुहावरों की चर्चाओं में एक अहम बात रह ही गई। लेख जिस मुद्दे से चला था, उससे भटक गया है। जी हां- असली मुद्दा महिलाओं की सुरक्षा है, जो इन नारों की बहस में दम तोड़ता दिख रहा है।
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नारों पर उठे सवालों को पूरी तरह खारिज भी नहीं कर सकते
रही बात नारों के सही-गलत होने की तो दोनों तरफ के नारों में सामान्यीकरण है। गेहूं के साथ घुन भी पिसने वाली बात। आवाज उठा रहे पुरुष इसी बात पर ध्यान खींचना चाह रहे हैं और उनकी इस आपत्ति को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी आंदोलन के नारे और उसके मूल उद्देश्य को एक ही चीज मान लेना भी ठीक नहीं होगा।
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नारों पर आपत्ति बाद में दर्ज हो सकती है, अभी मुद्दा जरूरी है
नारा उस आंदोलन की भाषा है, जबकि महिला सुरक्षा उसकी मूल मांग। इसलिए अभी बहस का केंद्र यह नहीं होना चाहिए कि कौन सा नारा किसे बुरा लगा। सवाल यह होना चाहिए कि जो महिलाएं असुरक्षित हैं, उनकी मांग का समाधान कैसे हो? नारों पर आपत्ति बाद में भी दर्ज की जा सकती है।
महिला सुरक्षा के नाम पर दिल्ली यूनिवर्सिटी में गजब की नारेबाजी हो रही है। लड़कियों ने गर्दा उड़ा दिया है।
नारा- 1
एक कचौड़ी, दो समोसा
इन मर्दो का क्या भरोसानारा- 2
एक सुट्टा दो चाय…
मर्द जात हाय-हायनारा- 3
हमारी स्कर्ट नहीं है छोटी
इन मर्दो की सोच है छोटी pic.twitter.com/cqMjVLC1lr— SKY (@ysatyandra) September 29, 2026