समुद्र नहीं, अब हिमालय से आएगी ‘सुनामी’, बह जाएंगे हजारों गांव! IIT रुड़की का अलर्ट, खतरे में 93 लाख आबादी

नई दिल्ली
 हिमालय की बर्फीली चोटियों के बीच एक ऐसी तबाही आकार ले रही है, जो सुनामी से कम खतरनाक नहीं है. IIT रुड़की के रिसर्चर्स ने एक चौंकाने वाली स्टडी में बताया है कि हिमालय के पहाड़ों पर बनी ग्लेशियल झीलों का दायरा तेजी से बढ़ रहा है. ‘साइंटिफिक रिपोर्ट्स’ में छपी रवींद्र कुमार और सौरभ विजय की इस रिसर्च के अनुसार, हाई माउंटेन एशिया (HMA) क्षेत्र में 2016 से 2024 के बीच इन झीलों के क्षेत्रफल में 5.5 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी हुई है. वर्तमान में करीब 31,000 से ज्यादा ऐसी झीलें हैं, जो 93 लाख लोगों के लिए सीधा खतरा बन गई हैं.

क्या है ‘हिमालयी सुनामी’ या GLOF?

    जब पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियर पिघलते हैं, तो उनका पानी खाली जगहों पर जमा होकर झीलें बना लेता है. इन झीलों के चारों ओर पक्के बांध नहीं होते, बल्कि ये ढीली चट्टानों, बर्फ और मलबे (Moraine) के प्राकृतिक बांधों से घिरी होती हैं.

    जब ग्लोबल वार्मिंग की वजह से पानी का दबाव बढ़ता है या कोई एवलांच (बर्फ का तूफान) इन झीलों में गिरता है, तो ये बांध गुब्बारे की तरह फट जाते हैं. इसे ही ‘ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड’ (GLOF) या हिमालयी सुनामी कहा जाता है.

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    केदारनाथ की 2013 वाली त्रासदी और 2023 में सिक्किम में आई बाढ़ इसी तरह के खतरे के बड़े उदाहरण हैं. ये झीलें इतनी ऊंचाई पर स्थित हैं कि जब इनका पानी नीचे गिरता है, तो वह जबरदस्त रफ्तार पकड़ लेता है.

    इसमें सिर्फ पानी नहीं होता, बल्कि अपने साथ बोल्डर, मिट्टी और पेड़ों को बहाकर लाने वाला एक ‘चलता-फिरता पहाड़’ बन जाता है, जो रास्ते में आने वाली हर चीज को तबाह कर देता है.

वैज्ञानिकों ने कैसे पहचाना इन 31,000 टाइम बमों को?

हजारों फीट की ऊंचाई और बेहद कठिन रास्तों के कारण इन झीलों की निगरानी करना नामुमकिन जैसा था. लेकिन IIT रुड़की के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक टेक्नोलॉजी का सहारा लिया. उन्होंने नासा (NASA) और यूनाइटेड स्टेट्स जियोलॉजिकल सर्वे (USGS) के ‘लैंडसैट 8’ के हाई-रेजोल्यूशन डेटा का उपयोग किया. इसके साथ ही यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के ‘सेंटिनल 1 और 2’ और कोपरनिकस डिजिटल एलिवेशन मॉडल की मदद ली गई.
अमेरिका के नेशनल रिकॉनेस्सेंस ऑफिस द्वारा 3 जनवरी 1976 को ली गई इस तस्वीर में माउंट एवरेस्ट बीच में दिख रहा है. (AP)

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इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके राडार और ऑप्टिकल सेंसर बादलों के पार भी देख सकते हैं. इसकी मदद से वैज्ञानिकों ने 20,000 से 1,00,000 वर्ग मीटर तक की छोटी झीलों की भी सटीक पहचान की है. अब इस तकनीक से ‘तीसरे ध्रुव’ (Third Pole) कहे जाने वाले इस पूरे इलाके की रूटीन मॉनिटरिंग मुमकिन हो गई है.

किन इलाकों में सबसे तेजी से फैल रही हैं झीलें?

स्टडी के मुताबिक, झीलों के बढ़ने की रफ्तार हर इलाके में अलग-अलग है:

किलियन शान (Qilian Shan): इस क्षेत्र में झीलों के क्षेत्रफल में सबसे ज्यादा 22.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है.

पूर्वी हिमालय: यह इलाका सबसे ज्यादा संवेदनशील है क्योंकि यहां इन झीलों की संख्या सबसे अधिक है.

भारत की स्थिति: भारत में करीब 30 लाख लोग सीधे तौर पर इन अस्थिर झीलों के नीचे बसे हुए हैं.

बढ़ती गर्मी और बदलते मानसून की वजह से ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं. जहां पहले बर्फ हुआ करती थी, अब वहां गहरे और अस्थिर पानी के तालाब बन गए हैं.

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93 लाख लोगों पर मंडराता मौत का साया

दुनिया भर में ग्लेशियर की बाढ़ से जितने लोगों को खतरा है, उनमें से 62 प्रतिशत लोग अकेले हाई माउंटेन एशिया क्षेत्र में रहते हैं. हिमालय के इस हिस्से में रहने वाले कई परिवार झीलों से महज 10 किलोमीटर के दायरे में बसे हैं. इसका मतलब है कि अगर कोई झील फटती है, तो लोगों को चेतावनी देने और सुरक्षित स्थान पर ले जाने के लिए समय बहुत ही कम मिलेगा. ये झीलें ‘टिकिंग टाइम बम’ की तरह हैं, जिनकी दीवारें मिट्टी और बर्फ की बनी हैं. अगर ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार यही रही, तो आने वाले समय में केदारनाथ जैसे हादसों का खतरा और बढ़ सकता है.