निवेशकों को बैंक जमा या सरकारी बॉन्ड की तरह ब्याज नहीं देता। दूसरी तरफ, जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं तो निवेशकों को सरकारी बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाले निवेश विकल्पों से बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद होती है। ऐसे में कुछ निवेशक सोने से पैसा निकालकर इन विकल्पों में लगाने लगते हैं। इससे सोने की मांग घट सकती है और कीमतों पर दबाव पड़ता है। इसके अलावा, अमेरिकी डॉलर की मजबूती भी सोने के लिए चुनौती बनती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत डॉलर में तय होती है। डॉलर मजबूत होने पर दूसरे देशों के खरीदारों के लिए सोना महंगा हो जाता है। इससे इसकी मांग प्रभावित हो सकती है।
सोना अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम से 42,321 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हो चुका है। सोना 29 जनवरी 2026 को अपने ऑल टाइम हाई पर पहुंचा था। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर 24 कैरेट सोने का वायदा भाव घटकर 1,38,419 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत 3,884.90 डॉलर प्रति औंस हो गई। उधर इंडियन बुलियन ज्वैलर्स एसोसिएशन (IBJA) के आंकड़ों के अनुसार 30 अक्टूबर तक 24 कैरेट सोने की कीमत घटकर 1,40,054 रुपये रह गई।
शेयर बाजार की गिरावट ने भी बढ़ाई मुश्किल
सोने की कीमतों में अचानक आई गिरावट की एक वजह अमेरिकी शेयर बाजार में टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयरों का टूटना भी है। खासतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में निवेशकों की चिंता बढ़ी है। पिछले कुछ समय से निवेशक AI कंपनियों में बड़े पैमाने पर पैसा लगा रहे हैं। इन कंपनियों ने भविष्य में बेहतर कमाई और कारोबार बढ़ने की उम्मीद में भारी निवेश किया है। लेकिन अब बाजार में यह सवाल उठने लगा है कि क्या AI पर किया जा रहा इतना बड़ा खर्च वास्तव में कंपनियों को उतना मुनाफा दिला पाएगा, जितनी उम्मीद की जा रही है। इसी चिंता के कारण टेक्नोलॉजी शेयरों में बिकवाली बढ़ी। आमतौर पर जब शेयर बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक सोने को सुरक्षित निवेश मानकर उसमें पैसा लगाते हैं। लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग रही।
एक्सपर्ट्स के मुताबिक टेक्नोलॉजी शेयरों में तेज गिरावट के कारण कुछ निवेशकों को सोने जैसे सुरक्षित निवेश से भी पैसा निकालना पड़ा। इसकी एक वजह मार्जिन कॉल भी हो सकती है। मार्जिन कॉल का मतलब है कि जब कोई निवेशक उधार लेकर शेयर या दूसरे वित्तीय उत्पादों में निवेश करता है और बाजार में नुकसान बढ़ने लगता है, तो ब्रोकर उससे अतिरिक्त पैसा जमा करने के लिए कहता है। ऐसा पैसा जुटाने के लिए निवेशक को सोना जैसे दूसरे निवेश बेचने पड़ सकते हैं। इससे सोने की कीमतों पर भी दबाव बढ़ता है।
नवंबर और दिसंबर में सोने की कीमतों को कौन से कारक प्रभावित करेंगे?
अमेरिकी अर्थव्यवस्था के तीसरी तिमाही के आंकड़े भी बाजार के लिए अहम हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, इस दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने एक साल में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की। इसकी प्रमुख वजह उपभोक्ताओं का मजबूत खर्च और कंपनियों की ओर से AI में बढ़ता निवेश रहा। फेडरल रिजर्व ने भी ब्याज दरों को स्थिर रखते हुए अर्थव्यवस्था के आकलन में सुधार किया है। इसका मतलब है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत बनी हुई है। ऐसे में ब्याज दरों में जल्द कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है।
4,000 डॉलर से नीचे सोने की कीमत, फिर भी मिल सकता है सहारा
सोने की कीमतों में गिरावट के बावजूद कुछ ऐसे कारण हैं, जो आने वाले समय में इसे सहारा दे सकते हैं। इनमें दुनिया के केंद्रीय बैंकों की खरीदारी सबसे अहम है। दुनिया के कई केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाते हैं। इसके पीछे मकसद अपने भंडार को मजबूत करना और किसी एक देश की मुद्रा पर निर्भरता कम करना होता है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब सोने की कीमत 4,000 डॉलर प्रति औंस से नीचे आती है तो केंद्रीय बैंकों की खरीदारी बढ़ने की संभावना रहती है। ऐसे में मौजूदा गिरावट के दौरान भी केंद्रीय बैंकों की मांग सोने को सहारा दे सकती है। इसके अलावा, भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और महंगाई का जोखिम भी सोने की मांग को प्रभावित करते हैं। अगर दुनिया में आर्थिक या राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने की तरफ रुख कर सकते हैं। हालांकि, एशियाई बाजारों में सोने की मांग फिलहाल कमजोर बताई जा रही है। भारत और चीन जैसे बड़े बाजारों में मांग में सुस्ती रहने से कीमतों को तुरंत मजबूती मिलना मुश्किल हो सकता है।
अमेरिका के चुनाव और राजनीतिक घटनाक्रम पर भी रहेगी नजर
नवंबर में अमेरिका के राजनीतिक घटनाक्रम का असर भी वित्तीय बाजारों पर देखने को मिल सकता है। 3 नवंबर को होने वाले चुनावों में यह तय होगा कि अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा। इन चुनावों में प्रतिनिधि सभा और सीनेट की स्थिति पर निवेशकों की नजर रहेगी। राजनीतिक फैसलों का असर अमेरिका की आर्थिक नीतियों, सरकारी खर्च, टैक्स और व्यापार से जुड़े फैसलों पर पड़ सकता है। हालांकि चुनावों का सोने की कीमतों पर सीधा और एक जैसा असर नहीं होता। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि चुनाव के बाद आर्थिक नीतियों को लेकर कितनी स्पष्टता रहती है और बाजार इन नीतियों को किस तरह देखता है।
क्या नवंबर-दिसंबर में सोने की कीमतें बढ़ेंगी या गिरेंगी?
आने वाले दो महीनों में सोने की कीमतों को लेकर फिलहाल दोनों तरह की संभावनाएं बनी हुई हैं। एक तरफ अमेरिकी ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचा रहने की आशंका, मजबूत अर्थव्यवस्था और एशियाई बाजारों में कमजोर मांग सोने पर दबाव बना सकती है। दूसरी तरफ, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, 4000 डॉलर से नीचे कीमतों पर खरीदारी की संभावना और वैश्विक अनिश्चितता सोने को सहारा दे सकती है।
एक्सपर्ट्स ने भी कीमती धातुओं में हालिया गिरावट के बाद आगे सुधार की उम्मीद जताई है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सोने की कीमतें तुरंत बढ़ने लगेंगी। बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। निवेशकों को नवंबर और दिसंबर में अमेरिकी रोजगार आंकड़ों, महंगाई के आंकड़ों, फेडरल रिजर्व के संकेतों और डॉलर की चाल पर नजर रखनी चाहिए। इन कारकों से सोने की अगली दिशा तय करने में मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर, सोने की कीमतों में आई गिरावट को सिर्फ एक दिन की घटना मानना सही नहीं होगा। इसके पीछे वैश्विक अर्थव्यवस्था, ब्याज दरों और निवेशकों की बदलती रणनीति जैसे कई कारण हैं। इसलिए आने वाले महीनों में सोने की कीमतों में तेजी और गिरावट दोनों की संभावना बनी हुई है। जो लोग सोने में निवेश करना चाहते हैं, उन्हें जल्दबाजी में फैसला लेने के बजाय बाजार की स्थिति और अपनी निवेश क्षमता को ध्यान में रखकर कदम उठाना चाहिए।
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