जगन्नाथ रथ यात्रा में अधर पना की अनोखी परंपरा, जानें इसका रहस्य

 आज से जगन्नाथ महाप्रभु  की रथ यात्रा शुरू हो रही है, जो कि ओडिशा के पुरी शहर में निकाली जाती है. इस दिन पुरी की बड़दांडा (मुख्य मार्ग) पर सजे विशाल रथ लाखों श्रद्धालुओं का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं. रथ यात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने-अपने रथों पर सवार होकर मंदिर से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं. यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था का जीवंत रूप है, जब भगवान स्वयं अपने भक्तों के बीच आते हैं.

रथयात्रा की भव्यता के साथ-साथ इसमें कई प्राचीन परंपराएं भी जुड़ी हुई हैं, जो इसकी गहराई को और बढ़ाती हैं. इनमें जगथा यात्रा और अधर पना जैसे विशेष अनुष्ठान शामिल हैं. ये अनुष्ठान हमें यह सिखाते हैं कि भगवान की कृपा सिर्फ जीवित लोगों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि वे दिवंगत आत्माओं और अदृश्य शक्तियों के लिए भी समान रूप से करुणामय हैं. ये परंपराएं हमें याद दिलाती हैं कि भगवान का प्रेम और आशीर्वाद इस संसार की सीमाओं से परे है और हर किसी के लिए है.

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क्या है अधर पना की परंपरा?
रथ यात्रा की सबसे आकर्षक रस्मों में से एक है आधार पना. इसमें पनीर, दूध, चीनी और मसालों से एक विशेष मीठा पेय तैयार किया जाता है और इसे बड़े मिट्टी के बर्तनों में भरकर देवताओं को अर्पित किया जाता है. इन बर्तनों को रथ पर रखा जाता है और अर्पण के बाद फोड़ दिया जाता है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्रिया देखने में सरल लगती है, लेकिन इसके पीछे एक गहरा अर्थ छिपा है.

जगन्नाथ परंपरा में, रथों के पीछे न केवल अनगिनत भक्त चलते हैं, बल्कि अदृश्य शक्तियां भी भगवान का आशीर्वाद लेने के लिए चलती हैं. जानकारी के मुताबिक, प्रथा के अनुसार, रथ यात्रा के दौरान रथों के चारों ओर मंडराती आत्माओं और भूतों की प्यास बुझाने के लिए रथों पर रखे मीठे पानी के बर्तनों को तोड़ा जाता है.

अधर का अर्थ- अधर का अर्थ होता है होंठ.
पना का अर्थ- यह दूध, गुड़, पनीर, केला, जायफल और कई सुगंधित मसालों से तैयार किया जाने वाला एक बेहद स्वादिष्ट पेय (शरबत) होता है.

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इस परंपरा के तहत मिट्टी के तीन बड़े-बड़े घड़ों (जिन्हें लाठिया कहा जाता है) में यह शरबत भरकर तीनों रथों पर भगवान के होंठों की ऊंचाई के पास रखा जाता है. इसके बाद पूजा-अर्चना कर इन घड़ों को जानबूझकर रथ पर ही तोड़ दिया जाता है, जिससे सारा प्रसाद बहकर रथ के चारों ओर फैल जाता है.

इंसान क्यों नहीं पीते यह प्रसाद? किसे अर्पित होता है यह भोग?
यह जगन्नाथ धाम का इकलौता ऐसा महाप्रसाद है जिसे न तो कोई आम भक्त ग्रहण करता है और न ही मंदिर के पुजारी. शास्त्रों और लोक मान्यताओं के अनुसार, यह भोग उन अदृश्य, अतृप्त, आत्माओं या पितरों के लिए होता है, जो रथयात्रा के दौरान भगवान के दर्शन के लिए पुरी में आती हैं.

आत्माओं की मुक्ति का मार्ग
माना जाता है कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में केवल इंसान और देवता ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की हर दृश्य-अदृश्य शक्ति शामिल होती है. जो आत्माएं मोक्ष से वंचित रह गई हैं, वे भगवान के इस पवित्र स्पर्श वाले प्रसाद को पाकर तृप्त होती हैं.

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सड़क पर फैलाने का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक कारण
मिट्टी के घड़े तोड़ने से यह दिव्य पेय रथ की लकड़ियों और जमीन पर फैल जाता है. मान्यता है कि जो अदृश्य शक्तियां और पार्श्व देवता रथ के पहियों या अंगों में मौजूद होते हैं, वे इसे सीधे भूमि से ही ग्रहण कर लेते हैं.

नकारात्मक शक्तियों को शांत करने की परंपरा
इस रहस्यमयी परंपरा का एक पहलू यह भी है कि यात्रा के दौरान ब्रह्मांड की तमाम सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियां पुरी धाम में मौजूद होती हैं. सृष्टि के संतुलन को बनाए रखने और इन अदृश्य शक्तियों को शांत व संतुष्ट करने के लिए महाप्रभु स्वयं अपने अधरों (होंठों) से छुआकर इस प्रसाद को भूमि पर अर्पित कर देते हैं.