यूपी बीजेपी अध्यक्ष की रेस में पंकज चौधरी क्यों सबसे आगे? अंदरखाने की रणनीति आई सामने

लखनऊ 
यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष के लिए केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने नामांकन कर दिया है। पिछले कुछ दिनों से पंकज ही अध्यक्ष की रेस में सबसे आगे चल रहे थे। कल उनके नाम के ऐलान के साथ ही उनकी नई पारी की शुरुआत भी हो जाएगी। बीजेपी ने पंकज चौधरी को यूपी जैसे सबसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी देकर एक साथ कई निशाने साधने की कोशिश की है। पंकज चौधरी को केंद्रीय नेतृत्व का विश्वस्त और पूर्वांचल की राजनीति में कुर्मी (OBC) समुदाय का बड़ा चेहरा माना जाता है। सपा की पीडीए का काट भी पंकज चौधरी के जरिए ही साधा जाएगा।

पंकज चौधरी गोरखपुर के पड़ोसी जिले महाराजगंज से सांसद हैं। पंकज चौधरी ने राजनीतिक करियर की शुरुआत गोरखपुर से की थी। वर्ष 1989 में उन्होंने गोरखपुर नगर निगम के लिए पार्षद का चुनाव जीतकर राजनीति में कदम रखा था। 1989 से 1991 तक गोरखपुर के उपमहापौर (Deputy Mayor) रहे। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति का रुख किया और महाराजगंज लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे। पंकज चौधरी की सबसे बड़ी ताकत उनका विशाल संसदीय अनुभव है। वह महाराजगंज सीट से छह बार सांसद चुने जा चुके हैं। 1991 में पहली बार सांसद बने। इसके बाद 1998, 1999, 2014, 2019 और अब 2024 में उन्हें जीत मिली है। हालांकि बीच के दो चुनावों 2004 और 2009 में उन्हें हार का सामना भी करना पड़ा था।

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संगठन और नेतृत्व का समीकरण
पंकज चौधरी का जन्म 12 नवंबर 1964 को गोरखपुर में ही हुआ था। उन्होंने राजनीति विज्ञान से एमए किया हुआ है। उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद के लिए पंकज चौधरी का नाम मजबूत होने के पीछे कई महत्वपूर्ण राजनीतिक समीकरण हैं। सबसे महत्वपूर्ण कुर्मी समुदाय का एक बड़ा चेहरा होना है। उन्हें अध्यक्ष बनाकर भाजपा पूर्वांचल और अवध क्षेत्र में कुर्मी वोटों को मजबूती से अपने पाले में रख सकती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 11 कुर्मी सांसद चुने गए। इनमें 3 भाजपा, 7 सपा के हैं। माना जाात है कि कुर्मी वोटों का ध्रुवीकरण हुआ। भाजपा अब नहीं चाहती कि कुर्मी वोट बंटे।

सपा के समीकरण की काट
2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए का नारा देकर यूपी में जीत हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी के समीकरण को तोड़ने के लिए एक मजबूत ओबीसी चेहरे की अध्यक्ष के रूप में आवश्यकता थी। पंकज चौधरी इस कसौटी पर खरे उतरते हैं। जातीय संतुलन साधने केलिए भी बीजेपी को ओबीसी नेता की जरूरत थी। पंकज जिस कुर्मी बिरादरी से हैं, वो ओबीसी में यादव के बाद सबसे बड़ी आबादी है। लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्वांचल में कुर्मी वोटों के छिटकने से बड़ा नुकसान हुआ था।

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केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा
इसके साथ ही पंकज चौधरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के विश्वस्त माने जाते हैं। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री के रूप में उनका चयन उनकी प्रशासनिक क्षमता और निष्ठा को दर्शाता है। अपनी साफ-सुथरी छवि, अनुभवी नेतृत्व और मजबूत जातीय आधार के कारण ही पंकज चौधरी उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए एक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पसंद साबित हुए हैं।

7 बार से सांसद, केंद्र में मंत्री
पंकज चौधरी पर क्यों दांव लगाया, जानिए
    पॉलिटिकल एक्सपर्ट कहते हैं- पंचायत और विधानसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी ने ओबीसी के कुर्मी समाज से आने वाले चौधरी पर दांव लगाया है, क्योंकि कुर्मी समाज की आबादी यादवों के बाद सबसे ज्यादा है। कुर्मी समाज को बीजेपी का वोट बैंक माना जाता है, लेकिन लोकसभा में इस समाज का एक हिस्सा PDA के नाम पर सपा के साथ गया था। इसे देखते हुए भाजपा ने दांव खेला है।

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भाजपा के चौथे कुर्मी जाति के अध्यक्ष होंगे
    पंकज चौधरी कद्दावर नेता हैं। अच्छे प्लानर माने जाते हैं। पार्षद से राजनीति की शुरुआत की। गोरखपुर के डिप्टी मेयर रहे। 1991 में पहली बार सांसद बने। राहत रूह तेल कंपनी के मालिक हैं।
    2024 में 11 कुर्मी सांसद चुने गए। इनमें 3 भाजपा, 7 सपा के हैं। कुर्मी वोटों का ध्रुवीकरण हुआ। भाजपा अब नहीं चाहती कि कुर्मी वोट बंटे।
    यूपी भाजपा में इससे पहले तीन बार कुर्मी भाजपा अध्यक्ष रह चुके हैं- विनय कटियार, स्वतंत्र देव सिंह और ओम प्रकाश सिंह। पंकज बने तो भाजपा के चौथे कुर्मी जाति के अध्यक्ष होंगे।
    गोरखपुर की राजनीति में योगी और पंकज चौधरी ही बीजेपी के दो बड़े क्षत्रप हैं। दोनों की राजनीति का तरीका अलग है। एक को सरकार और एक को संगठन की कमान सौंपने के भी कई राजनीतिक मायने हैं।