पहले जान लें ये 5 बातें, वरना बढ़ सकता है होम लोन का आर्थिक बोझ

आज के समय में अपना घर खरीदना ज्यादातर लोगों का सबसे बड़ा सपना होता है. लेकिन बढ़ती प्रॉपर्टी कीमतों के कारण अधिकतर लोग होम लोन का सहारा लेते हैं. बैंक और फाइनेंस कंपनियां आसान EMI और प्री-अप्रूव्ड ऑफर दिखाकर ग्राहकों को जल्दी लोन लेने के लिए आकर्षित करती हैं. हालांकि होम लोन 20 से 30 साल तक चलने वाली बड़ी वित्तीय जिम्मेदारी होती है. इसलिए बिना सही योजना के लिया गया लोन भविष्य में आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है.

अपनी कमाई के हिसाब से तय करें लोन राशि

कई बार बैंक ग्राहकों को उनकी सालाना आय से पांच या छह गुना तक होम लोन देने की पेशकश करते हैं. सुनने में यह ऑफर आकर्षक लगता है, लेकिन सिर्फ बैंक की पात्रता के आधार पर बड़ा लोन लेना समझदारी नहीं मानी जाती. लोन की राशि हमेशा आपकी वास्तविक आय, खर्च और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर तय करनी चाहिए. विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी व्यक्ति की मासिक EMI उसकी टेक-होम सैलरी के 35 से 40 प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. अगर EMI बहुत ज्यादा हो जाएगी तो घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, मेडिकल जरूरतें और बचत प्रभावित हो सकती है. उदाहरण के तौर पर अगर किसी व्यक्ति की मासिक आय 1 लाख रुपये है और वह 50 हजार रुपये EMI में देने लगे, तो बाकी खर्चों को संभालना मुश्किल हो सकता है. इसलिए आरामदायक EMI तय करके ही लोन लेना बेहतर माना जाता है.

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कम अवधि का लोन लंबे समय में देगा फायदा

होम लोन की अवधि यानी टेन्योर भी बेहद अहम भूमिका निभाती है. लंबी अवधि चुनने पर EMI कम हो जाती है, लेकिन कुल ब्याज काफी ज्यादा देना पड़ता है. वहीं छोटी अवधि में EMI थोड़ी ज्यादा होती है, लेकिन ब्याज का बोझ कम रहता है. मान लीजिए किसी व्यक्ति ने 1 करोड़ रुपये का होम लोन 8 प्रतिशत ब्याज दर पर लिया. अगर वह 15 साल की अवधि चुनता है तो उसकी EMI करीब 95 हजार रुपये होगी और कुल ब्याज लगभग 72 लाख रुपये देना पड़ेगा. वहीं 25 साल की अवधि में EMI करीब 77 हजार रुपये रह जाएगी, लेकिन कुल ब्याज बढ़कर 1.32 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है. यानी सिर्फ EMI कम करने के चक्कर में लाखों रुपये अतिरिक्त ब्याज देना पड़ सकता है. इसलिए ऐसी अवधि चुननी चाहिए जो संभालने में आसान हो और ब्याज का बोझ भी कम रखे.

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को-बॉरोअर जोड़ने से मिल सकते हैं बड़े फायदे

कई लोग होम लोन लेते समय अपने जीवनसाथी, माता-पिता या भाई-बहन को को-बॉरोअर बनाते हैं. इससे सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि दोनों की संयुक्त आय के आधार पर बैंक ज्यादा लोन मंजूर कर सकता है. इससे बेहतर घर खरीदने या EMI का दबाव कम करने में मदद मिलती है. इसके अलावा टैक्स बचत में भी फायदा मिलता है. अगर दोनों लोग घर के सह-मालिक हैं और लोन चुका रहे हैं, तो दोनों अलग-अलग टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं. हालांकि को-बॉरोअर बनाने से जिम्मेदारी भी साझा हो जाती है. अगर EMI समय पर जमा नहीं होती तो दोनों का क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है. इसलिए किसी को को-बॉरोअर बनाने से पहले उसकी वित्तीय स्थिति और लंबे समय की जिम्मेदारियों को समझना जरूरी है.

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अलग-अलग बैंकों के ऑफर जरूर तुलना करें

अक्सर लोग जल्दबाजी में पहला ही होम लोन ऑफर स्वीकार कर लेते हैं, जबकि अलग-अलग बैंकों और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों की ब्याज दरों और शर्तों में बड़ा अंतर हो सकता है. सिर्फ आधा प्रतिशत कम ब्याज दर भी लंबे समय में लाखों रुपये की बचत करा सकती है. उदाहरण के लिए 75 लाख रुपये के 20 साल के लोन पर अगर ब्याज दर 0.5 प्रतिशत कम मिल जाए, तो कुल भुगतान में बड़ी राहत मिल सकती है. इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज, फोरक्लोजर नियम और ग्राहक सेवा जैसी चीजों की भी तुलना करनी चाहिए. कुछ बैंक डिजिटल सुविधाएं और आसान प्रीपेमेंट विकल्प देते हैं, जो भविष्य में काफी मददगार साबित होते हैं.

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स्मार्ट प्लानिंग से आसान बनेगा घर का सपना

होम लोन सिर्फ एक वित्तीय उत्पाद नहीं, बल्कि लंबे समय का कमिटमेंट होता है. इसलिए इसे लेते समय जल्दबाजी के बजाय सही योजना बनाना बेहद जरूरी है. कम EMI के लालच में बहुत लंबी अवधि चुनना या जरूरत से ज्यादा लोन लेना भविष्य में आर्थिक तनाव बढ़ा सकता है. विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर अतिरिक्त आय या बोनस मिले तो समय-समय पर प्रीपेमेंट जरूर करें. शुरुआती वर्षों में थोड़ी-थोड़ी अतिरिक्त रकम जमा करने से ब्याज का बोझ काफी कम हो सकता है और लोन जल्दी खत्म हो सकता है. सही बजट, सही बैंक और सही अवधि चुनकर कोई भी व्यक्ति अपने घर का सपना बिना आर्थिक दबाव के पूरा कर सकता है.

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लोन की जिम्मेदारी

होम लोन सिर्फ एक फाइनेंशियल प्रोडक्ट नहीं है. यह एक लंबी अवधि की जिम्मेदारी है. EMI न चुकाने के गंभीर नतीजे हो सकते हैं. इससे पेनल्टी चार्ज लग सकते हैं, ब्याज की लागत बढ़ सकती है, और आपके क्रेडिट स्कोर पर बुरा असर पड़ सकता है. खराब क्रेडिट स्कोर होने पर भविष्य में लोन या क्रेडिट कार्ड मिलना मुश्किल हो सकता है. बहुत ज़्यादा गंभीर मामलों में, लंबे समय तक डिफ़ॉल्ट करने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है या लोन देने वाला आपकी प्रॉपर्टी पर कब्जा भी कर सकता है.

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